अखिलेश आर्येन्दु- होली या वासंती-नवशस्येष्टि वैदिक परंपरा में तमाम लौकिक यज्ञों का उत्सव है। और भारतीय संस्कृति, समाज और परंपरा का सबसे सनातन अनोखा और प्रेरक त्योहार भी है। यह जहां वैदिक दर्शन, संस्कृति, प्रकृति, समाज और मूल्यों का त्योहार है, वहीं पर, पौराणिक परंपरा का आंदोत्सव और मदनोत्सव है। ज्योतिष के मुताबिक होली प्रकृति के पंच महाभूतों, ग्रहों और नक्षत्रों से ताल्लुक रखती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रकृति के शाश्वत रंगों में सूर्य का रंग लाल, धरती का रंग नारंगी और बैगनी, चांद का रंग हल्का पीला व सफेद, मंगल का लाल, बुद्ध का रंग हरा, शुक्र का रंग सफेद और वृहस्पति का रंग पीला माना गया है। इसी तरह आकाश का रंग नीला, जल का रंग नीला व हरा, अग्नि का रंग पीला व लाल और इन्द्र धुनष के सात रंग होते हैं। होली इन्द्रधुनष के रंगों से रंगी है, जिसमें सात रंग हैं। ये सात रंग समाज, संस्कृति, कला, साहित्य, विज्ञान, शिक्षा और अध्यात्म के रंग हैं। सभी रंगों की अपनी महत्ता है। जैसे इन सभी रंगों में एक पूरकता दिखती है, इसी तरह से होली के रंगों में भी पूरकता है, जो हमारे समाज, संस्कृति, कला, शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, अध्यात्म और दर्शन से ताल्लुक रखते हैं। व्यक्ति से व्यक्ति, परिवार से परिवार, समाज से समाज और संस्कृति से संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ने वाला होली जैसा दूसरा कोई त्योहार नही है। ऋग्वेद का पहला मंत्र अग्नि से ताल्लुक रखता है। कहा जाता है अग्नि से नव संवत्सर की शुरुआत होती है। जैसे प्रकृति में नव पल्लव उगने के पहले पुराने व बेकार (खराब) पत्तों या फूलों हटा दिए जाते हंै, उसी तरह हमें अपने अंदर की बुराइयों को ही नहीं, समाज, संस्कृति, विचार व कार्यों में जो गंदगियां दिखें, उन्हें खत्म करना जरूरी है। यानी पुराना, अनुपयोगी और दूषित को हटाना होली का संदेश है। वेदों का संदेश है कि नूतनता, उत्तमता और मौलिकता को हासिल करने के लिए सभी तरह के तमस, बुराई या गंदगियों को खत्म करना होगा।वैदिक परंपरा में वासंती-नवशस्येष्टि लौकिक परंपरा में होली कही जाती है। होली शब्द की उत्पत्ति हुलहुली शब्द से हुई है। इसका मूल रूप जिसका मायने है- शुभ अवसर की ध्वनि या उद्घोष। इसका सबसे पुराना रूप होलाका है। मुंडक उपनिषद् के अनुसार आकाश के पांच मंडल हैं। इन सभी मंडलों से ब्राह्मंड की पूर्णता की अभिव्यक्ति होती है। विजय भी पूर्णता का प्रतीक है। उपनिषद् में उलुलय विजय के उद्घोष की उच्चारण ध्वनि है।पौराणिक परंपरा में यह कई मिथकों, कथाओं से जुड़ी हुई है। ऋतु परिवर्तन का त्योहार होने के कारण ठंठाई का पेय का इस्तेमाल तो होता ही है, भोजन में ऋतु के मुताबिक मीठे, मेवों, फलों, खादान्नों और रसों का इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार ऋतु के बदलाव के महीनों में आहार-विहार में भी बदलाव होना चाहिए। इसी तरह शास्त्रों के अनुसार आपसी सदभावना को बढ़ाने और पुराने गिले-सिकवे दूर कर दिल में सदभाव भरने से मन, तन और मत सभी में स्वच्छता का भाव पैदा होता है। इसी तरह सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना को मूल्यवान बनाने के लिए मानव मूल्यों को, उत्सवधर्मी बनाने का यह सबसे बढ़िया अवसर है।होली के व्यापक स्वरूप के संदर्भ में देखें तो बंगाल में ‘डोल जात्रा’ तमिलनाडु पहुंच कर कामन पोडगई बन जाता है। और तमिलनाडु से आगे बढ़कर यह अच्छाई की कामना के साथ कर्नाटक में कामना हब्बा बन जाती है। कामना हब्बा की कामना रंगमय होती है तो महाराष्ट्र में यह रंग पंचमी बन जाती है और गोवा में शिमगो बनकर गुजरात में गोविंदा होली कहलाने लगती है। और फिर उत्तर भारत पंजाब में होला-मोहल्ला आगे बढ़ता हुआ हरियाणा में धुलेंडी बनकर बिहार में फगुआ के साथ उत्तर प्रदेश में होली खेलने वृंदावन और राम के साथ अयोध्या में रंग बरसाती हुई, बरसाने आकर स्नेह-प्रेम के रस के साथ कृष्ण-गोपियों के धाम मथुरा में लट्ठ जमा देती है।
होली संस्कृति-समाज के प्रचलित रंगों का त्योहार है। हमारी संस्कृति और कला में रंगों का विशेष मायने है। होली में जिन रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, उनके खास मायने और प्रतीक हैं। ये रंग हमारे जीवन से जुड़े हैं। महज एक दिन इन रंगों का महत्त्व नहीं है, बल्कि हमारा जीवन ही रंगों से जुड़ा हुआ है। इसलिए कहा जाता है कोई ऐसा कार्य, व्यवहार व विचार नहीं करना चाहिए जिससे जीवन का कोई रंग, बदरंग हो जाए। इन रंगों के विशेष संदेश हैं। रंगों का अपना विज्ञान और गुण है। रंगों की अपनी दुनिया है। इसलिए जब हम अपने जीवन के रंगों से जुड़ते हैं और उन पर अमल करते हैं तो, हमारी दुनिया या हमारा संसार रंगों से युक्त हो जाता है। हम जानते हैं केसरिया-पीला रंग सम्पन्नता का प्रतीक है लाल-गुलाबी रंग प्रेम का, सफेद शांति का और हरा हमारी निश्छल प्रकृति का। गौरतलब है ये सभी रंग हम होली खेलते हुए इस्तेमाल करते हैं। यदि ये रंग हमारे जीवन-व्यवहार के रंग बन जाएं और हर दिन को हम होली के रंग से रंग कर लें, तो होली महज एक दिन या एक महीने का उत्सव नहीं होगा, बल्कि हर दिन हमारा रसमय उत्सव बन जाएगा।लोक संस्कृति और कृषि संस्कृति में परंपरा और मान्यता नहीं है, बल्कि विज्ञान और दर्शन की भी धाराएं हैं। रंगों, रसों और मूल्यों का त्योहार होने के कारण इसमें गोधन, खादान्न और रसों का खास महत्त्व है। गोबर से बने उपले, जो होली जलाने के काम आते हैं सनातन परंपरा से इस्तेमाल होते आए हैं। होली पर बनाए जाने वाले पकवान में पौष्टिकता, व्यवहार में पवित्रता व पूरकता और विचारों में मूल्यपरकता होली के साथ सनातन काल से जुड़े हुए हैं। इस त्योहार का प्रमुख व्यंजन गुझिया है, जो खास मेवों, मावे और मीठे को मिलाकर बनाई जाती है। गुझिया होली में सभी जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों और संस्कृतियों को एक सूत्र में बाधने की प्रतीक है। जैसे गुझिया में सभी तरह के मेवों, खोया, सूजी, मैदा, मावों और मीठे के मिश्रण को मिलाकर एक खास तरह से मैदे या आटे की बनी लोई में मिश्रण को भरा जाता है और मुरेड़ कर बाध दिया जाता है, उसी तरह सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक गुझिया में प्रेम, सदभावना, सहिष्णुता, अहिंसा, सत्य, क्षमा, करुणा और न्याय जैसे मूल्यों को भर कर यानी एक सूत्र में मिलाकर बाधना होली की सार्थकता है। जैसे गुझिया की लोई को खूब अच्छी तरह से मुरेड़ कर बाधा जाता है जिससे वह पकाते (तलते) समय फूटे नहीं, उसी तरह सभी तरह के मूल्यों को एकता के रंग में सदभावना व प्रेम के बंधन में बाधना चाहिए, जिससे कभी टूटे-फूटे नहीं।