खाड़ी युद्ध : कौन जीता है कौन हार गया ? 

अमेरिका -इस्राईल द्वारा ईरान पर थोपा गया बलात युद्ध अनियंत्रित होकर बेहद ख़तरनाक दौर से गुज़र रहा है। दर्जनों देशों को अपनी चपेट में ले चुके इस युद्ध में अब तक खरबों डॉलर का नुक़्सान हो चुका है। अमेरिका -इस्राईल द्वारा मिलकर ईरान को जिस स्तर तक नुक़्सान पहुँचाया जा चुका है और अब भी उसके ईंधन उत्पाद केंद्रों पर हमले कर लगातार पहुँचाया जा रहा है उससे निश्चित रूप से पहले ही चार दशकों से वैश्विक रूप से आर्थिक व व्यवसायिक प्रतिबंध झेल रहे ईरान की कमर ज़रूर टूट जाएगी। परन्तु इसके बावजूद आप इस निष्कर्ष पर क़तई नहीं पहुँच सकते कि ईरान यह युद्ध हार चुका है या हार जायेगा। हाँ इसके विपरीत ईरान ने अपनी बहादुरी,सूझबूझ,योग्यता,दृढ़ संकल्प,विश्वास व कूटनीति के बल पर न केवल दुनिया के कई देशों के चेहरों से नक़ाब हटा दी है बल्कि अमेरिका के बारे में पूरे विश्व में बन चुकी ‘विश्वविजेता’ जैसी ‘फ़र्ज़ी धारणा’ को भी ध्वस्त कर दिया है। बेशक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस्राईली प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू के बहकावे में आकर या एप्सटीन फ़ाइल के भयादोहन (ब्लैक मेलिंग ) का शिकार होकर ईरान को वेनेज़ुएला की ही तरह कमतर आंक कर उसपर हमला बोल दिया। दुनिया ने देखा कि ईरान पर आक्रमण करने से पूर्व अमेरिका व इस्राईल ने किस तरह ईरान के भीतर सत्ता विरोधी बग़ावत कराने जैसा कुटिल असफल प्रयास किया। गोया आज युद्ध में अपनी मुंह की खाने वाला अमेरिका मोसाद की मदद से ईरान में सत्ता विरोधी बग़ावत का भी सहारा लेना चाह रहा था जोकि राष्ट्रवादी ईरानियों ने मुमकिन नहीं होने दिया। न ही शाह की औलाद को ईरान पर पुनः थोपने की अमेरिकी चाल कामयाब हो सकी। लिहाज़ा यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अमेरिका अपनी इस कुटिल चाल में शुरुआत में ही ईरान से हार चुका था। इसके बाद बावजूद इसके कि 27 फ़रवरी तक दोहा में ईरान – अमेरिका के बीच वार्ता हो ही रही थी फिर भी अमेरिका ने इस्राईली सेना के साथ मिलकर 28 फ़रवरी को पूरी ताक़त के साथ तेहरान पर हवाई हमले शुरू कर दिये। इन हमलों का उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन,ईरान की मिसाइल क्षमताओं, परमाणु सुविधाओं और नेतृत्व को नष्ट करना था। ऑपरेशन रोअरिंग लायन और ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नमक इस पहले आक्रमण में ही ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामनेई का तेहरान के पेस्टूर स्ट्रीट स्थित आवास पर हमले में निधन हुआ। इसी हमले में कुल लगभग 40 ईरानी अधिकारी मारे गए, साथ ही 1,444 से अधिक मौतें भी हुईं जिनमें 168 बच्चे और 200 महिलाएं शामिल थीं। इसी हमले में अयातुल्लाह अली  ख़ामनेई के दामाद, पोते और अली शमखानी जैसे अन्य शीर्ष सुरक्षा अधिकारी मारे गये। रक्षा मंत्री अमीर नासिर जादेह और रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडर मोहम्मद पाक पुर व सेना प्रमुख अब्दुल रहीम मूसवी सहित चार वरिष्ठ सैन्य अधिकारी मारे गये। इसी हमले में ईरान के 24 प्रांत प्रभावित हुए, जहां 500 से अधिक सैन्य लक्ष्य जैसे एयर डिफ़ेंस , मिसाइल लॉन्चर, नौसेना और नतांज, कराज, क़ुम की परमाणु सुविधाएं आदि के नष्ट होने के दावे किये गये। तेहरान में राष्ट्रपति भवन, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, ख़ुफ़िया मंत्रालय और ग्रैंड बाज़ार को काफ़ी क्षति पहुंची नागरिक इलाक़ों पर भीषण बमबारी की गयी। अमेरिकी टॉम हॉक मिसाईल से मिनाब में लड़कियों के एक स्कूल में 148 लड़कियों की मौत हो गयी तथा कई अस्पतालों को नुक़्सान हुआ। साइबर हमलों से इंटरनेट कनेक्टिविटी बुरी तरह प्रभावित हुई और उसी समय होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया जिससे वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति बाधित हुई। इसी हमले के बाद ही ट्रंप ने यह कहना शुरू कर दिया था कि ‘हमने संघर्ष के शुरुआती घंटों में ही ईरान की वायुसेना को ज़मीन पर ही तबाह कर दिया गया, और अब ईरान के पास वास्तविक “एयरफ़ोर्स ” जैसी कोई प्रभावी ताक़त नहीं रही। उन्होंने कई बार यह दावा किया है कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में ईरान की नौसेना (नेवी) और वायु सेना (एयर फ़ोर्स) की क्षमता “ख़त्म ” या “लगभग पूरी तरह नष्ट” कर दी गई है। नौसेना को लेकर उन्होंने दावा किया है कि ईरान के लगभग सभी युद्धपोत और नौसैनिक जहाज़ डूबा दिए गए हैं, कुछ बयानों में “32 जहाज़ों के तलहटी में जाने” और “58 नौसैनिक  जहाज़ों के नष्ट होने” जैसी संख्या भी दी गई।परन्तु ट्रंप के इन दावों के बावजूद ईरान के मिसाइल और ड्रोन के भरपूर हमले अभी भी जारी हैं। और यह हमले अपनी तीव्रता व सटीकता के चलते अमेरिका सहित पूरे विश्व हो अचंभे में डाले हुये हैं। भले ही ईरानी सेना, नेवी और रडार व वायु रक्षा प्रणाली को भारी नुक़्सान ज़रूर पहुँचा है परन्तु इसके बावजूद ईरान ने पूरी दुनिया को यह भी दिखा दिया है कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने सिर्फ़ अमेरिकी पिट्ठू शाह पहलवी की सत्ता को ही नहीं उखाड़ फेंका बल्कि 47 वर्षों तक वैश्विक प्रतिबंधों के बाकजूद ईरान ने  सामाजिक,शैक्षिक,वैज्ञानिक व सामरिक स्तर पर जो तैयारियां की हैं आज उसी का नतीजा सामने है। अन्यथा कौन सोच सकता था कि राष्ट्रपति ट्रंप के ईरान को हर प्रकार से तबाह बर्बाद करने के बार बार किये जा रहे दावों के बावजूद ईरान इस्राईल के हाइफ़ा पोर्ट व उसके पेट्रोलियम प्लांट और फाइनेंशियल ढांचे को तबाह कर देगा। अमेरिका के सर्व शक्तिशाली युद्धपोत यू एस एस अब्राहम लिंकन को धुआँ धुआँ कर उसे पीठ दिखाकर भागने के लिए मजबूर कर देगा, गेराल्ड आर फ़ोर्ड जैसा सबसे ख़तरनाक युद्धपोत पीठ दिखाकर भाग जायेगा , ईरान ने आयरन डोम के चलते इस्राईल के अजेय होने की धारणा को भी धूल धूसरित कर दिया। और तो और नेतन्याहू के अनेक स्पष्टीकरण व कथित ‘प्रकटीकरण ‘ के बावजूद तमाम विश्लेषक नेतन्याहू के जीवित होने को लेकर अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। बहरहाल मैदान ए करबला से प्रेरित आईआरजीसी  के 5 लाख प्रशिक्षित सैनिकों व 25 लाख से अधिक की आरक्षित सेना ने अपने बुलंद हौसलों से युद्ध में हार जीत की परिभाषा को बदल कर रख दिया है। ईरान ने अमेरिका के अजेय होने की धारणा को ध्वस्त करते हुये दुनिया को यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि आख़िर इस युद्ध में कौन जीता है कौन हार गया ? संपर्क : 9896219228 

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