अहीरों की बुद्धि,वीरता और वैभव को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश है पुस्तक ‘अहीरवाल की ख्यात’ -गोपेन्द्र

भारत के प्राचीनतम निवासियों में से एक अहीरों (यादव जो युग नायक श्रीकृष्ण के वंशज हैं)की बुद्धि,वीरता और वैभव को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं डॉक्टर सुरेंद्र कुमार।उसी की कड़ी में इन्होंने हरियाणा के अहीरों के प्राचीन,वैभवशाली अहीर रियासतों और उनकी वीरगाथाओं को पुस्तक के रूप में देश-दुनिया के सामने लाने का काम किया है।यह पुस्तक रोहिड़ा पब्लिकेसंस नजफगढ़ नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है। सुरेन्द्र कुमार की यह कृति एक सामान्य पुस्तक ना होकर एक शोध ग्रंथ है।जिसे बहुत मेहनत से वर्षों के शोध के उपरांत पुस्तक के रूप में ढाला गया है। किसी भी समुदाय के व्यावहारिक सिद्धांत, आत्म- प्रतिबिंब , नैतिक दृष्टिकोण, जो उसके इतिहास व संस्कृति की गहराई में निहित हो वो अत्यंत परिवर्तनशील युग, विरोधियों द्वारा हानिकारक प्रचार के समक्ष रक्षा कवच का कार्य करते हैं। पुस्तक का उद्देश्य अपने पूर्वजों के इतिहास को पढ़ना मात्र नहीं है, बल्कि उनकी बुद्धि, वीरता, वैभव,नैतिकता और सद्गुणों का अनुसरण और सिंहावलोकन करने का अवसर प्रदान करना है।read more:https://worldtrustednews.in/supreme-court-grants-relief-to-youtuber-elvish-quashes-fir-filed-by-up-police/
यहां मैथिलीशरण गुप्त की निम्न पंक्तियां इस पुस्तक की सार्थकता को साबित करती हुई मालूम पड़ती हैं- निज पूर्वजों सद्गुणों को, यत्न से मन में धरो,सब आत्म परिभव-भाव तज निज रूप से चिंतन करो,निज पूर्वजों के सद्गुणों का गर्व जो रखते नहीं, वह जाति जीवित जातियों में, रह कहीं सकती नहीं।’अहीरवाल’ हरियाणा के गुड़गांव जिले के उत्तरी-पश्चिमी भाग, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ के पूरे जिले झज्जर तथा भिवानी जिले की तहसीलों का कुछ भाग तथा राजस्थान की बहरोड़, मुंडावर एवं बानसूर तहसीलों और कोटकासिम के परगना को सम्मिलित रूप से अहीरवाल के नाम से जाना जाता है।अहीरवाल की सीमाएं समय- समय पर बदलती रही हैं।’ख्यात’ शब्द संस्कृत भाषा की ख्याति शब्द से अपभ्रंश होकरौ बना है , जिसका अर्थ है प्रसिद्धि, यश, शोहरत। यह पुस्तक इतिहास परक ख्यात है जो अतीत काल की ऐतिहासिक घटनाओं से, अपने पूर्वजों के स्वर्णिम भूतकाल से अवगत कराती है और उससे प्रेरणा लेने को प्रेरित करने काम करती है। इसमें अहीरवाल इलाके की कृषि, जलवायु, रीति-रिवाज,दुर्ग-महल शिल्पकला, वेशभूषा, भाषा, पूजा पद्धति, मुद्रा आदि के बारे में जानकारी दी गई है।प्रस्तुत पुस्तक में कुल चार अध्याय हैं। प्रथम अध्याय राजवंश है। जिसमें रेवाड़ी राज्य के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इत्यादि का वर्णन है।द्वितीय अध्याय जागीर है, जिसमें नसीबपुर की बावनी जागीर, जिला महेंद्रगढ़ भाड़ावास जागीरदारी, जिला रेवाड़ी जागीर बादशाहपुर, जिला गुरुग्राम डेरोली अहीर जागीर, महेंद्रगढ़ बिहाली जागीर, जिला महेंद्रगढ़ चुरैती जागीर, जिला अलवर इत्यादि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।read more:https://worldtrustednews.in/bjp-releases-new-candidate-list-for-by-elections-announces-candidates-for-5-seats-in-4-states/ तृतीय अध्याय में चौधरी का वर्णन किया गया है जबकि चतुर्थ अध्याय जैलदारी के बारे में जानकारी देता है। मांडन की लड़ाई के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इस पुस्तक में जो भी बातें लिखी गई है उसके बारे में प्रमाणिक सहायक संदर्भ ग्रंथ सूची संलग्न है।साथ ही इस पुस्तक में चित्रों के अंतर्गत अहीरवाल इलाके के प्राचीनता, वैभव और समृद्ध संस्कृति की झलक मिलती है।  लेखक ने इस पुस्तक को पाठकों तक पहुंचाने के लिए काफी मेहनत की है और जो कुछ भी लिखा है उसके बारे में प्रमाणिक संदर्भ ग्रंथों की सूची संलग्न की है,ताकि इससे जांचा परखा जाए और आगे शोधकर्ताओं द्वारा और भी शोध हो ताकि नई-नई जानकारियां लोगों के सामने लायी जाएं।लेखक ने इस पुस्तक को लिखने के उद्देश्य के बारे में कहा है इस पुस्तक को लिखने का मुख्य उद्देश्य ही संपूर्ण अहीरवाल क्षेत्र में राजवंशों के परिवारों का बिखरा हुआ जो इतिहास है उसको पुस्तक प्रारूप देकर इतिहासविदों, अहीरवाल के इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों, शोधकर्ताओं, आमजन एवं समाचार पत्र-पत्रिकाओं और टेलीविजन के पत्रकार बंधुओं को उससे अवगत कराना और उसको काल-कवलित होने से बचाना है। अतः अब हम सबकी जिम्मेदारी बनती है की लेखक ने जिस उद्देश्य को लेकर इस पुस्तक की रचना की उसे अमली जामा पहनाने के लिए इस पुस्तक के बारे में जानकारी अधिक से अधिक लोगों पर पहुंचाएं ताकि लोग इससे प्रेरणा लेकर एक समृद्ध राष्ट्र की कल्पना को साकार कर सकें।
*और अंत में*
यद्यपि हमें इतिहास अपना प्राप्त पूरा है नहीं,
हम कौन थे इस ज्ञान को, फिर भी अधूरा है नहीं।
हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।।

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