नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष को रोकने और इसे महायुद्ध में बदलने से बचाने के लिए दुनिया की बड़ी ताकतें पर्दे के पीछे से सक्रिय हो गई हैं। ताजा रणनीतिक घटनाक्रम और वरिष्ठ राजनयिकों से मिली जानकारी के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए ओमान और तुर्की के माध्यम से अत्यंत गोपनीय बैकचैनल वार्ताएं आयोजित की जा रही हैं।ऐतिहासिक रूप से मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले ओमान ने एक बार फिर दोनों कट्टर प्रतिद्वंद्वियों को संवाद की मेज पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजनयिक हलकों में हो रही इन चर्चाओं से यह भी स्पष्ट हुआ है कि इस शांति प्रक्रिया में केवल तुर्की और ओमान ही नहीं, बल्कि भारत, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देश भी लगातार कूटनीतिक संदेशों के आदान-प्रदान का जरिया बने हुए हैं। भारत के संबंध ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संतुलित और बेहतर हैं, जिसे देखते हुए नई दिल्ली ने क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संवाद के रास्ते खुले रखने में मदद की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों की मध्यस्थता और कूटनीतिक दबाव ने युद्ध को अनियंत्रित होने से रोकने में एक सिक्योरिटी वाल्व की तरह काम किया है। हालांकि, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि इन गुप्त वार्ताओं का हालिया घोषित 5-दिवसीय युद्ध विराम के फैसले पर कितना सीधा प्रभाव पड़ा है, लेकिन इसके सकारात्मक संकेत जरूर मिले हैं। युद्ध के चौथे सप्ताह में प्रवेश करने के साथ ही यह पहली बार देखा जा रहा है कि इतने सारे प्रभावशाली राष्ट्र एक साथ मिलकर वाशिंगटन और तेहरान के बीच की खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं। चर्चा है कि आने वाले समय में कूटनीतिक समाधान की कोशिशें और तेज हो सकती हैं। कूटनीतिक गलियारों में यह दावा भी किया जा रहा है कि पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र की कोशिशों के बाद भविष्य में होने वाली उच्च स्तरीय बैठकों में अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शामिल हो सकते हैं। फिलहाल, सैन्य तनाव के बीच इन गुप्त वार्ताओं ने वैश्विक स्तर पर शांति की नई उम्मीद जगाई है।