कपास का कफ़न  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा –गुप्ता मेडिकल स्टोर के उस सबसे ऊंचे रैक पर, जहां रोशनी भी पहुंचने से कतराती थी, वह गुलाबी पैकेट पिछले बारह सालों से एक तपस्वी की तरह जमा हुआ था। उस पर जमी धूल अब महज मिट्टी नहीं, बल्कि एक ठोस पुरातात्विक परत बन चुकी थी जिसे खुरचने के लिए कार्बन-डेटिंग की जरूरत पड़ती। पैकेजिंग पर बनी उस मॉडल की मुस्कान अब फीकी पड़कर एक डरावनी रूहानी हंसी में तब्दील हो गई थी, मानो वह दुकान में आने वाले हर ग्राहक को अपनी बदकिस्मती पर चिढ़ा रही हो। जेन-जी की भाषा में कहें तो वह पैकेट उस दुकान का सबसे बड़ा रेड फ्लैग था, जो चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि मेरा अंत करीब है। उसका प्लास्टिक अब इतना चिपचिपा और गल चुका था कि अगर उसे गलती से छू लिया जाए, तो उंगलियों पर एक ऐसा केमिकल अवशेष रह जाता जो शायद आवर्त सारणी के किसी तत्व से मेल न खाता। उस रैक के कोने में बैठा वह पैकेट महज एक सैनिटरी प्रोडक्ट नहीं, बल्कि बैक्टीरिया और फंगस का एक आलीशान पेंटहाउस बन चुका था, जहां नमी और सड़न ने मिलकर अपनी एक अलग ही सल्तनत कायम कर ली थी। गुप्ता जी ने उसे कभी हटाने की जहमत नहीं उठाई, क्योंकि उनके लिए वह रैक का एक हिस्सा नहीं बल्कि दुकान की नींव का पत्थर बन चुका था।read more:https://khabarentertainment.in/baba-brahmadev-fair-begins-in-jamouli-crowds-of-devotees-gather-three-day-event-on-chaitra-purnima-devotees-offer-flags-and-torches/ उस पैकेट के भीतर का कॉटन अब रद्दी कागज की लुगदी जैसा सख्त और बेजान हो गया था, जो किसी भी जीवित त्वचा के संपर्क में आते ही उसे सैंडपेपर की तरह छील देने की कसम खा चुका था। उसकी सोखने की क्षमता अब शून्य से भी नीचे गिरकर एक ऐसे पत्थर में बदल गई थी, जिस पर पानी की एक बूंद भी गिरती तो वह शर्म से वहीं सूख जाती। वह पैकेट उस दौर का गवाह था जब इंटरनेट टूजी की रफ़्तार से रेंगता था, लेकिन आज के फाइवजी ज़माने में उसकी मौजूदगी किसी ऐतिहासिक त्रासदी से कम नहीं थी। केमिस्ट के पास जब भी कोई नया ग्राहक आता, वह पैकेट अपनी धुंधली आंखों से उम्मीद भरी निगाहों देखता कि शायद आज उसे इस नर्क से मुक्ति मिलेगी। मगर उसकी बदबू और उस पर पड़े मकड़ी के जालों को देखकर आधुनिक लड़कियां अपना मुंह फेर लेतीं और अल्ट्रा-थिन या मेंस्ट्रुअल कप्स की मांग करके गुप्ता जी के विंटेज कलेक्शन का दिल तोड़ देतीं। उस पैकेट का पोस्टमार्टम किया जाता तो पता चलता कि उसके एडहेसिव ने अपनी पकड़ कब की छोड़ दी थी और वह अब महज एक मरा हुआ अवशेष था, जिसे दुकान की शेल्फ ने जबरदस्ती कंधा दे रखा था।read more:https://khabarentertainment.in/jangipur-police-take-swift-action-on-upi-cyber-fraud-entire-amount-of-rs-48159-safely-returned-timely-complaint-proved-key-to-success एक दिन शाम के धुंधलके में एक लड़की दुकान पर आई और उसने सीधे उसी रैक की ओर इशारा किया। गुप्ता जी की आंखें चमक उठीं, उन्हें लगा कि आज उनके इस सड़े हुए खजाने का कोई कद्रदान मिल ही गया। उन्होंने बड़े जतन से उस पैकेट को उतारा, अपनी मैली रुमाल से उसकी सदियों पुरानी धूल झटकी और बड़े गर्व से उसे काउंटर पर रख दिया। लड़की ने पैकेट को हाथ में लिया, उसकी चिपचिपाहट और उस पर उगे सूक्ष्म फंगस को बड़े ध्यान से देखा। उसके चेहरे पर कोई घृणा नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसने बिना मोलभाव किए उसकी मुंहमांगी कीमत चुकाई और पैकेट को अपने बैग में रख लिया। वह पैकेट अपनी इस अप्रत्याशित विदाई पर हैरान था, उसे लगा कि शायद अब उसका इस्तेमाल एक अंतिम विभीषिका के रूप में किया जाएगा। उसे खुशी थी कि कम से कम वह उस दम घोंटने वाले रैक से तो आज़ाद हुआ, भले ही उसका अंत किसी डस्टबिन में हो या किसी डर्मेटोलॉजिकल डिजास्टर के रूप में।read more:https://khabarentertainment.in/organized-under-the-aegis-of-mangal-maitri-seva-mandal-in-nagar-panchayat-sadat-ghazipur/   शाम के धुंधलके में एक एलीट लुकिंग लड़की दुकान पर आई और उसने सीधे उसी रैक की ओर इशारा किया। गुप्ता जी की बांछें खिल गईं, उन्होंने फौरन डंडा उठाया और उस ऐतिहासिक मलबे को नीचे उतार लाए। उन्होंने बड़े जतन से मैली रुमाल से उसकी बारह साल की धूल झटकी और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोले कि बेटा, ये असली चीज़ है, आजकल तो सब मिलावट आती है। लड़की ने पैकेट की चिपचिपाहट और उस पर उगे सूक्ष्म फंगस को बड़े ध्यान से देखा और बिना मोलभाव किए पूरे पैसे चुका दिए। वह पैकेट अपनी इस अप्रत्याशित विदाई पर गदगद था, उसे लगा कि शायद अब उसका इस्तेमाल किसी महान उद्देश्य के लिए होगा। लड़की दुकान से बाहर निकली और सीधे सामने खड़ी अपनी चमकती हुई मर्सिडीज में जा बैठी। पैकेट को उसने अपनी बगल वाली सीट पर बड़े सम्मान से रखा। उसे लगा कि शायद वह किसी लग्जरी स्पा में जा रहा है। मगर जैसे ही गाड़ी घर के गैरेज में रुकी, लड़की ने उस सड़े हुए पैकेट को निकाला और अपने पुराने विंटेज ट्रैक्टर के इंजन के पास ले गई। उसने पैकेट फाड़ा और उस बारह साल पुराने, सख्त और पथरीले कॉटन से मोबिल ऑयल का सबसे गंदा रिसाव पोंछना शुरू कर दिया। पैकेट की आत्मा यह देखकर चीख उठी कि जिस कोमलता का दावा वह सदियों से कर रहा था, उसका अंत एक पुराने लोहे के इंजन की कालिख साफ करने वाले ‘पोछे’ के रूप में हुआ।

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