जिम का पहला दिन

Dr. Suresh Kumar Mishra: जब मनुष्य का पेट उसकी कमीज के बटनों से विद्रोह करने लगता है और आईना उसे डराने के बजाय ‘कॉमेडी सर्कस’ का मंच लगने लगता है, तब उसे अचानक ‘स्वास्थ्य’ की याद आती है। हमारे मित्र ‘लल्लू प्रसाद’ के साथ भी यही हुआ। लल्लू प्रसाद ने तय किया कि वे अब ‘देह-यष्टि’ को सुडौल बनाएंगे और मोहल्ले के उस ‘मसल-मेनिया’ जिम में दाखिला लेंगे, जहाँ बाहर ही एक सांड जैसे दिखने वाले पहलवान की तस्वीर लगी थी।लल्लू प्रसाद जिम ऐसे पहुँचे जैसे कोई क्रांतिकारी फांसी के फंदे की ओर बढ़ रहा हो। उनके हाथ में ‘फ्लोरोसेंट’ हरे रंग की पानी की बोतल थी और शरीर पर वह ‘ट्रैकसूट’ था जिसे पहनकर वे कम और ‘तैयार किया हुआ सोफा’ ज्यादा लग रहे थे।जिम के भीतर का दृश्य किसी ‘यातना गृह’ से कम नहीं था। वहाँ लोहे के भारी-भरकम टुकड़ों से लोग ऐसे कुश्ती लड़ रहे थे जैसे वे उनके पुश्तैनी दुश्मन हों। जिम का ‘ट्रेनर’ वह प्राणी था जिसके पास गर्दन नाम की चीज नहीं थी; उसका सिर सीधे उसके कंधों से उगा हुआ मालूम पड़ता था। उसने लल्लू को देखते ही ऐसी मुस्कान दी, जैसे कसाई बकरे को देखकर देता है।read more:https://pahaltoday.com/bus-hits-eeco-car-on-yamuna-expressway-6-killed-and-13-injured/ ट्रेनर ने कहा, “आज ‘लेग डे’ है!”लल्लू को लगा शायद पैरों की मालिश होगी। पर अगले ही पल उन्हें एक ऐसी मशीन पर लिटा दिया गया जो किसी भी कोण से मानवीय नहीं थी। लल्लू ने जब उस पर वजन लादकर पैर ऊपर उठाए, तो उनकी हड्डियों के भीतर से वैसी ही चरमराहट की आवाज आई जैसी पुराने जमाने के चरमराते हुए किवाड़ों से आती है। उनके घुटनों ने आपस में मीटिंग की और तय किया कि अब और साथ निभाना मुमकिन नहीं है।अगले आधे घंटे में लल्लू ने वह सब किया जो उन्होंने पिछले तीस सालों में नहीं किया था। उन्होंने लोहे की रॉड उठाई, रस्सियाँ पटकीं और ‘ट्रेडमिल’ पर ऐसे भागे जैसे पीछे कोई खूंखार कुत्ता पड़ा हो। उनका चेहरा लाल होकर उस टमाटर जैसा हो गया था जो फ्रिज में पड़े-पड़े गलने वाला हो। ट्रेनर चिल्ला रहा था— “नो पेन, नो गेन!” और लल्लू मन ही मन सोच रहे थे— “मोर पेन, टोटल ड्रेन!”जिम से बाहर निकलते वक्त लल्लू की चाल वैसी ही थी जैसी किसी ‘पेंगुइन’ की होती है जिसे अभी-अभी लकवा मार गया हो। उनकी रीढ़ की हड्डी उनसे ‘इस्तीफा’ मांग रही थी और उनके फेफड़े हवा के लिए वैसे ही तड़प रहे थे जैसे सूखे कुएँ में मछली।अगले दिन सुबह जब सूरज उगा, तो लल्लू के कमरे से कराहने की ऐसी आवाजें आईं कि पड़ोसियों को लगा शायद रात में कोई ‘आत्मा’ उनके घर में घुस आई है। लल्लू बिस्तर पर ऐसे जकड़े हुए थे जैसे उन्हें सीमेंट के घोल में जमा दिया गया हो। उनके हाथ ऊपर नहीं उठ रहे थे और पैर हिलाने पर ‘साउंड इफेक्ट’ पैदा हो रहे थे।तभी उनका फोन बजा। ट्रेनर का मैसेज था— “कल का वर्कआउट शानदार था! आज हम ‘चेस्ट और बाइसेप्स’ करेंगे। आ रहे हो न?”लल्लू ने बड़ी मुश्किल से एक उंगली हिलाई और जवाब टाइप किया। पर उन्होंने “यस” या “नो” नहीं लिखा। उन्होंने सीधे अपने मोबाइल से ‘जिम’ का ऐप डिलीट किया, ट्रेनर का नंबर ब्लॉक किया और पास वाले हलवाई को फोन लगाकर बोले— “भाई, दो प्लेट शुद्ध घी की कचौड़ी और एक्स्ट्रा चटनी भेज दे… ये शरीर नश्वर है, इसे लोहे से पीटकर क्या मिलेगा? आत्मा को तृप्त करना ही असली योग है!” अब लल्लू प्रसाद ‘वर्कआउट’ के बजाय ‘डाइट आउट’ पर ज्यादा यकीन कर रहे हैं।

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