सपनों का बीमा

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 

नीम का थान गांव में जब ‘चतुरसेन’ ने प्रधानी का पर्चा भरा, तो उन्होंने सड़कों और नालियों की घिसी-पिटी बातों को कूड़ेदान में डाल दिया। उनका चुनावी मुद्दा था—’सपनों का प्रबंधन’। चतुरसेन का तर्क था कि गरीब आदमी इसलिए गरीब है क्योंकि वह सपने भी फटे-पुराने देखता है। उन्होंने घोषणा की कि जो उन्हें वोट देगा, उसके सपनों को सीधे ‘क्लाउड सर्वर’ से जोड़ दिया जाएगा ताकि सोते समय उन्हें कम से कम प्रधानमंत्री बनने का सुख तो मिल सके। गांव के लोग, जो दिन भर धूप में गदहों की तरह खटते थे, इस ‘रंगीन नींद’ के वादे पर फिदा हो गए। चतुरसेन ने गांव के खंडहर हो चुके पंचायत भवन को ‘ड्रीम लैब’ घोषित कर दिया और वहां तीन पुराने कंप्यूटर मॉनिटर रखवा दिए, जिनमें केवल बिजली की स्पार्किंग दिखती थी। उनका कहना था कि यह ‘मेटावर्स’ का गांव संस्करण है, जिसे समझने के लिए उच्च कोटि की मूर्खता चाहिए।read more:https://khabarentertainment.in/tension-between-afghanistan-and-pakistan-is-once-again-reaching-a-dangerous-point/ प्रचार के अंतिम दिन चतुरसेन ने गांव के मंदिर के पास एक ‘इच्छा-मशीन’ लगाई, जो वास्तव में एक पुराना आटा चक्की का डिब्बा था जिस पर ढेर सारी चमकीली पन्नियां चिपकी थीं। उन्होंने दावा किया कि जो भी इस मशीन के पास अपनी नाक रगड़कर वोट की प्रतिज्ञा करेगा, उसे रात को सपने में गुप्त धन का पता चलेगा। पूरे गांव में होड़ मच गई; लोग अपनी आधी नींद और पूरा होश चतुरसेन के चरणों में चढ़ाने लगे। विपक्षी उम्मीदवार ‘भोलेनाथ’ ने चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि यह केवल एक डिब्बा है, लेकिन चतुरसेन ने पलटवार किया कि भोलेनाथ का ‘वाई-फाई’ कमजोर है, इसलिए उन्हें ईश्वरीय संकेत नहीं मिल रहे। जनता को लगने लगा कि अब हल चलाने की जरूरत नहीं है, बस चतुरसेन की कृपा से सपनों में ही फसल कट जाएगी और बैंक बैलेंस बढ़ जाएगा। गाँव का हर व्यक्ति सोते समय खर्राटे नहीं, बल्कि ‘विकास’ के मंत्र जपने लगा।read more:vhttps://khabarentertainment.in/former-minister-arvind-singh-gop-invited-to-the-enlightened-conference/ जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और चतुरसेन रिकॉर्ड मतों से जीत गए, पूरा गांव ‘इच्छा-मशीन’ से गुप्त धन का पता पूछने पहुंचा। चतुरसेन ने एक लंबा सा रिमोट दबाया (जो वास्तव में टीवी का खराब रिमोट था) और मशीन का ढक्कन खोल दिया। लोग हक्के-बक्के रह गए; मशीन के अंदर केवल एक पुरानी फटी हुई चप्पल और एक कागज का टुकड़ा था जिस पर लिखा था— “प्रिय ग्रामवासियों, सपना खत्म हुआ, अब जाग जाइए! गुप्त धन तो वह था जो मैंने आपसे चंदे के नाम पर वसूला और ‘सपनों का बीमा’ वह है जो मैंने अगले पांच साल के लिए अपनी कुर्सी का कर लिया है।” जनता सन्न खड़ी एक-दूसरे का मुंह ताक रही थी, तभी चतुरसेन अपनी नई एसयूवी पर सवार होकर ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ की फाइल जमा करने शहर की ओर निकल पड़े। पीछे रह गई तो बस वही चक्की वाली मशीन, जो अब बिना बिजली के भी गांव की सादगी का मजाक उड़ा रही थी।

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