एक भारतीय पति

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
भारतीय गृहस्थी के कुरुक्षेत्र में पत्नी वह अपराजेय महारथी है, जो बेलन को गांडीव की तरह नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम के डंडे की तरह इस्तेमाल करती है ताकि पति का ‘स्व’ और ‘अहं’ दोनों कुचले जा सकें। बेचारा पति एक ऐसा क्लर्क है, जिसकी फाइल पर पत्नी रूपी उच्चाधिकारी हर दस मिनट में नई आपत्ति लगा देता है। वह जब घर में प्रवेश करता है, तो उसे अहसास होता है कि उसकी हैसियत उस फटे हुए पायजामे जैसी है जिसे सिर्फ पोंछा लगाने के काम लाया जा सकता है। पत्नी की वाणी में वह मधुरता होती है जो सीधे कान के पर्दे फाड़कर कलेजे में छेद कर देती है, और उसका तर्क इतना वैज्ञानिक होता है कि वह सिद्ध कर देती है कि अगर सब्जी में नमक कम है, तो इसके पीछे पति के खानदान का सामंती इतिहास जिम्मेदार है। वह एक ऐसी तानाशाह है जो प्रजातंत्र का ढोंग करते हुए पति से पूछती है कि ‘खाने में क्या बनेगा?’, लेकिन अंततः वही बनता है जो पति को नापसंद हो, क्योंकि कष्ट ही मोक्ष का मार्ग है।पति के लिए पत्नी का सताना कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित ‘पंचवर्षीय योजना’ है जिसे वह प्रतिदिन सफलतापूर्वक लागू करती है। वह उसकी अलमारी को इस तरह ‘व्यवस्थित’ करती है कि बेचारा अपनी बनियान खोजने के लिए यूनेस्को की मदद मांगने पर मजबूर हो जाए, और जब वह न मिले, तो पत्नी अपनी दिव्य दृष्टि से उसे वहीं से निकाल लेती है जहाँ से वह दस बार देख चुका होता है। इस चमत्कार के बाद जो ताना मारा जाता है, वह किसी धारदार छुरे से अधिक गहरा घाव देता है कि ‘आंखें हैं या बटन?’। वह पति की छोटी-छोटी खुशियों को वैसे ही निगल जाती है जैसे कोई भ्रष्ट नेता विकास का बजट डकार जाता है। यदि पति दोस्तों के साथ हंसने की गुस्ताखी कर ले, तो घर लौटते ही उसे वह मौन व्रत झेलना पड़ता है जिसकी भयावहता के सामने हिमालय की गुफाएं भी फीकी पड़ जाएं। उसके व्यंग्य बाण इतने सटीक होते हैं कि अर्जुन भी शरमा जाए, और हर पंचलाइन में पति की सात पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।read more:https://pahaltoday.com/national-climate-physiology-innovation-challenge-launched/ एक सताने वाली पत्नी का सबसे प्रिय हथियार ‘तुलना’ है, जिसमें वह पड़ोस के उस निठल्ले वर्मा जी को भी साक्षात कुबेर और सत्यवादी हरिश्चंद्र सिद्ध कर देती है, ताकि पति को अपनी दरिद्रता और नैतिक पतन का बोध होता रहे। वह पति को एक ऐसा ‘प्रोजेक्ट’ मानती है जो कभी पूरा नहीं हो सकता, इसलिए वह उस पर लगातार संशोधन करती रहती है—कभी उसकी चाल-ढाल पर, तो कभी उसकी अक्ल के अंधेपन पर। उसके लिए पति एक ऐसा रेडियो है जिसका वॉल्यूम तो उसके हाथ में है, लेकिन उसकी बैटरी हमेशा पति के खून से चार्ज होती है। जब वह कहती है कि ‘मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए’, तो समझ लीजिए कि वह अगले तीन घंटे तक उन सब चीजों की लिस्ट सुनाने वाली है जो आपने उसे पिछले दस साल में नहीं दीं। उसकी शिकायतों का रजिस्टर कभी नहीं भरता, क्योंकि उसमें हर रोज नए अध्याय जोड़े जाते हैं, और पति उस पुराने स्कूल के मास्टर की तरह है जो बिना तनख्वाह के सजा भुगतने का आदि हो चुका है।आखिरकार सताया हुआ पति उस दार्शनिक की तरह हो जाता है जिसे नरक से अब डर नहीं लगता, क्योंकि उसका ‘होम ट्रायल’ पहले ही चल रहा है। पत्नी का सताना दरअसल एक कला है, जिसमें वह मौन और शोर का ऐसा मिश्रण तैयार करती है कि पति की बुद्धि घास चरने चली जाए और वह खुद को ही अपराधी मानने लगे। वह अपनी बीमारी का उपयोग एक रणनीतिक हथियार की तरह करती है, जहाँ मामूली सिरदर्द भी ‘शहादत’ की श्रेणी में आता है, लेकिन पति का तेज बुखार भी ‘काम से बचने का बहाना’ मात्र है। वह उसे खरीदारी के बाज़ारों में एक कुली की तरह ले जाती है और भुगतान के समय उसे एक एटीएम मशीन की तरह सम्मान देती है, जो उसकी एकमात्र उपयोगिता है। इस महान व्यंग्य नाटक में पत्नी ही लेखक है, वही निर्देशक है और वही दर्शक भी, जबकि पति वह जोकर है जिसे अपनी ही बेइज्जती पर ताली बजाने का अनिवार्य आदेश प्राप्त है। गृहस्थी की इस नूराकुश्ती में जीत हमेशा उसी की होती है, क्योंकि पति तो वह मोहरा है जिसे पिटने के लिए ही बिछाया गया है।

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