पान-मसाला, सिगरेट की बढ़ी कालाबाजारी, जिम्मेदार खामोश

बाराबंकी। तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ोतरी के प्रस्ताव के बाद नगर में पान-मसाला और सिगरेट के दाम अभी से बढ़ गए हैं। थोक विक्रेताओं ने माल की कालाबाजारी करने के लिए अभी से रोक लिया है। जिसके चलते अब छोटे दुकानदारों को पुराने रेट का माल अधिक दामों पर मुनाफाखोरी करते हुए बेचा जा रहा है। तंबाकू उत्पादों पर नई दरें अभी लागू नहीं हुई हैं, लेकिन नगर के सिगरेट और पान-मसाले के थोक विक्रेताओं ने इसे मुनाफाखोरी का अचूक हथियार बना लिया है। उन्होंने पुरानी रेट के माल को गोदामों में स्टॉक कर लिया है। जिससे अब नगर के बाजार में छोटे दुकानदारों के पास माल खत्म हो गया है। जिससे तंबाकू उत्पादों के शौकीन लोगों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बड़ी बात यह है कि जिन दुकानों पर पान-मसाला एवं सिगरेट मिल रहे हैं, वह भी प्रिंट रेट से अधिक दामों पर मजबूरन बेच रहे हैं। देवा कस्बे में पान मसाला, सिगरेट और तंबाकू उत्पादों की बिक्री इन दिनों उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का सबब बन गई है। जीएसटी बढ़ोतरी का हवाला देकर थोक से लेकर फुटकर विक्रेता तक ग्राहकों से निर्धारित एमआरपी से कहीं अधिक कीमत वसूल रहे हैं। स्थिति यह है कि कुछ उत्पादों पर 25 प्रतिशत तक, तो कुछ पर डेढ़ गुना तक अधिक दाम वसूले जा रहे हैं। स्थानीय बाजार में रजनीगंधा, कमला पसंद, पान बहार, सिग्नेचर, पान पराग और राजश्री जैसे पान मसाला ब्रांड एमआरपी से करीब 25 फीसदी अधिक कीमत पर बेचे जा रहे हैं। वहीं तुलसी तंबाकू, बाबा 120, विल्स, गोल्ड फ्लैक और क्लासिक जैसी सिगरेटों पर ग्राहकों से निर्धारित मूल्य से कहीं ज्यादा रकम ली जा रही है। बताया जा रहा है कि इस पूरे खेल की शुरुआत थोक स्तर से हो रही है। थोक व्यापारी ही दुकानदारों को ऊंचे दामों पर माल उपलब्ध करा रहे हैं, जिसके बाद फुटकर विक्रेता उसी आधार पर उपभोक्ताओं से मनमानी वसूली कर रहे हैं। उपभोक्ताओं का आरोप है कि अधिक कीमत का विरोध करने पर दुकानदार अभद्र व्यवहार करते हैं और कई बार उन्हें दुकान से भगा दिया जाता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक कस्बे के कुछ बड़े थोक व्यापारी इस पूरे नेटवर्क को संचालित कर रहे हैं और उनकी मिलीभगत से यह ‘ओपन लूट’ जारी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रशासन और जीएसटी विभाग की नजरों के सामने यह सब हो रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि एमआरपी से अधिक वसूली के इस खुले खेल पर आखिर कब लगाम लगेगी और उपभोक्ताओं को राहत कब मिलेगी।

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