रात के ठीक सवा तीन बजे जब जिला अस्पताल के नए-नवेले डायलिसिस विंग में दाखिल होइए, तो लगता है जैसे किसी फाइव-स्टार होटल के आईसीयू में आ गए हों, जहाँ बीमारी भी टाई लगाकर आती है। नीली एलईडी लाइट्स के बीच दस विदेशी मशीनें इस ऐंठ में खड़ी थीं मानो अभी-अभी जर्मनी से लोकतंत्र की नई परिभाषा सीखकर लौटी हों। गोपी अपनी माँ सावित्री को स्ट्रेचर पर धकेलते हुए हाँफ रहा था। फेफड़ों में भरता पानी जब गले से सीटी बजाता है, तो समझ लीजिए कि यमराज ने अर्जी पर पहली मुहर लगा दी है। डॉक्टर ने पर्चे पर लाल स्याही से ‘इमरजेंसी’ घसीट दिया था और गोपी ने अपनी जेब से चमचमाता सरकारी ‘गोल्डन कार्ड’ निकाला वही प्लास्टिक का टुकड़ा जिसे दिखाकर इस मुल्क का गरीब समझता है कि उसने सीधे विधाता के दफ्तर का पास बनवा लिया है। उसने नया, सीलबंद डायलाइजर फिल्टर मेज पर पटका। तकनीशियन ने किसी महायज्ञ के पुरोहित की तरह उस पर स्कैनर फेरा। अचानक मशीन ने एक तीखी चीख मारी और स्क्रीन पर लाल अक्षरों में एक रहस्यमय साक्षात अभिशाप कौंधा, ‘एरर कोड 404: इनवैलिड बारकोड! सत्र निरस्त।’यहीं से शुरू होता है असली रोमांच, जिसे हमारे देश में ‘प्रक्रिया’ कहा जाता है। तकनीशियन ने अपनी रिवॉल्विंग कुर्सी को झूला बनाते हुए चश्मा नासाग्र पर टिकाया और उस स्वर में बोला जिसमें थानेदार मर्डर केस की तफ्तीश बंद करता है, “देखो गोपी भाई, फिल्टर तो लखनऊ के सरकारी गोदाम से आया है, लेकिन इसका बारकोड मुंबई के मेन सर्वर से अभी लिंक नहीं हुआ। सॉफ्टवेयर इसे घुसपैठिया मान रहा है।” गोपी के पाँव काँप रहे थे। उसने दोनों हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, “बाबूजी, सील पैक डिब्बा है, माँ का दम घुट रहा है… बस बाईपास करके एक बटन दबा दीजिए!” तकनीशियन हँस दिया, जैसे किसी देहाती ने संसद भवन में खूँटा गाड़ने की इजाजत माँग ली हो। बोला, “पागल हुए हो क्या? यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है, तुम्हारे गाँव की ट्यूबवेल नहीं कि तार छीलकर जोड़ दिया और पानी बह निकला। बिना डिजिटल ठप्पे के अगर हाथ भी लगाया, तो मशीन का मदरबोर्ड लकवाग्रस्त हो जाएगा और हमारे पीछे विजिलेंस का कुत्ता छूट जाएगा। मुंबई का दफ्तर सुबह दस बजे लॉगिन करेगा, तभी सर्वर हरी झंडी देगा। तब तक धैर्य रखो, सिस्टम में श्रद्धा बहुत जरूरी चीज है।”read more:https://pahaltoday.com/a-grand-tiranga-yatra-was-taken-out-in-payagpur-under-the-leadership-of-the-bdo-the-market-echoed-with-chants-of-bharat-mata-ki-jai/रोमांच जब औकात से बाहर हो जाए तो वह सीधे त्रासदी की देहरी पर सिर पटकने लगता है। बाहर सड़क पार एक प्राइवेट नर्सिंग होम का शीशमहल चमक रहा था, जहाँ गेट पर ही लिखा था कि जीवन अनमोल है, पर पहले सात हजार नकद जमा कराइए। गोपी ने काउंटर पर अपनी जेबें उड़ेल दीं तीन सौ चालीस रुपये, एक खुरदुरी बीड़ी और साइकिल की टूटी चाबी। उसने हाथ जोड़कर अपना सस्ता चीनी मोबाइल और कलाई की घड़ी तक मेज पर रख दी, पर कॉरपोरेट धर्मशास्त्र में भावनाओं की कोई रसीद नहीं कटती; वहाँ सिर्फ नोटों का स्पर्श पाकर ही ऑक्सीजन के सिलेंडर जागते हैं। वह उल्टे पाँव दौड़ा और उस सरकारी सन्नाटे में अपनी माँ के स्ट्रेचर से लिपट गया। सावित्री देवी की पथराई आँखें छत के पंखे को नहीं, सीधे अपने बेटे के लाचार चेहरे को ताक रही थीं। उनके नीले पड़ते होंठ फड़फड़ाए, “गोपी… बेटा… सांस… नहीं…” और फिर एक घुरघुराहट के साथ उनका हाथ गोपी की उंगलियों से फिसलकर ठंडे कंक्रीट पर बेजान झूल गया। उस अंतिम हिचकी के सन्नाटे में गोपी की रीढ़ से होकर जो चीख उठी, उसने अस्पताल के सारे एयर-कंडीशनरों की ठंडक को एक झटके में पिघलाकर रख दिया।ठीक आठ बजकर बारह मिनट पर जब मौत अपना काम बिना किसी सर्वर एरर के पूरी ईमानदारी से निपटा चुकी थी उस जर्मन मशीन की छाती पर बत्ती हरी हो गई। स्क्रीन पर सुंदर अक्षरों में संदेश तैरने लगा ‘पैच अपडेटेड! बारकोड वैलिडेटेड। सिस्टम रेडी: पेशेंट को कनेक्ट करें।’ तकनीशियन ने चाय की चुस्की लेते हुए एक विजयी मुस्कान के साथ बाहर झाँका, “अरे ओ गोपी, ले आओ अम्मा को! लिंक आ गया है, सॉफ्टवेयर पास हो गया!” पर स्ट्रेचर पर अब किसी विदेशी तार, किसी फिल्टर या किसी अमृत-योजना की दरकार नहीं बची थी। गोपी ने अपनी मृत माँ के चेहरे पर अपना मैला, पसीने से भीगा गमछा खींच दिया था। वह शून्य नजरों से उस दिव्य स्क्रीन को घूर रहा था, जिस पर अब गर्व से चमक रहा था—‘डिजिटल भारत: हर नागरिक को सुलभ और पारदर्शी स्वास्थ्य सेवा।’ माँ की ठंडी देह पर गिरता गोपी के आँसुओं का एक-एक कतरा उस पूरी आधुनिक व्यवस्था की छाती पर थूक रहा था, जहाँ इंसान की साँसें उखड़ सकती हैं, पर किसी सर्वर का प्रोटोकॉल कभी झुक नहीं सकता।