वहां न कोई पीली दीवारें थीं, न कोई लोहे का गेट, न सोलर पैनल। वहां केवल चारों तरफ जमा दलदल था, जिसके बीचों-बीच बांस की तीन पुरानी बल्लियों के सहारे काला, फटा हुआ प्लास्टिक का एक तिरपाल बंधा था।और उस तिरपाल के नीचे, भीगी हुई मिट्टी पर सत्तर साल की बूढ़ी कस्तूरी अपनी फटी धोती में अपने आठ साल के अनाथ पोते बिट्टू को छाती से चिपकाए बैठी थी।
आसमान से मूसलाधार बारिश गिर रही थी और तिरपाल के बड़े-बड़े छेदों से गंदा पानी सीधे उस बूढ़ी औरत की रीढ़ पर टपक रहा था।यार, तुमने कभी देखा है कि जब सिस्टम किसी गरीब की झोपड़ी को अपनी फाइलों में महल बना देता है, तो उस वक्त लाचारी की ठंड कितनी जानलेवा हो जाती है?सर्वेयर ने हड़बड़ाकर अपना आईपैड कस्तूरी के चेहरे के सामने चमकाया।”अरे अम्मा! हमारे सर्वर पर तुम्हारा दो कमरों का पक्का मकान बनकर तैयार है। तुम इस कीचड़ में तिरपाल डालकर क्यों बैठी हो?”कस्तूरी ने थरथराते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। उसकी आवाज में केवल सूखी कंपकंपी थी।”बाबूजी… छह महीने पहले ठेकेदार और पंचायत के सेक्रेटरी आए थे। एक शीशे की मशीन पर मेरा अंगूठा लगवाया था और कहा था कि सरकार तुम्हारे नाम पर छत भेज रही है। उसके बाद न कोई ईंट आई, न कोई सीमेंट। मेरी झोपड़ी भी उन्होंने तुड़वा दी कि नया मकान बनेगा…”
जांच में तुरंत सच का पर्दाफाश हो गया।
ठेकेदार ने ब्लॉक के अफसरों से मिलकर जीपीएस स्पूफर सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया था। चार किलोमीटर दूर बने गांव के प्रधान के आलीशान गेस्ट हाउस के सामने कस्तूरी का नाम चस्पा किया, फोटो खींची, पोर्टल पर अपलोड की और डेढ़ लाख रुपये की सरकारी सब्सिडी डकार गए। कागजों में कस्तूरी अब लखपति और पक्के मकान की मालकिन दर्ज हो चुकी थी।सर्वेयर ने अपना चश्मा पोंछा और बड़ी दार्शनिक गंभीरता से बोला, “अम्मा, बात को समझो। सैटेलाइट का सॉफ्टवेयर कभी झूठ नहीं बोलता। डिजिटल ऑडिट में तुम्हारा मकान बन चुका है। अब अगर हम रिपोर्ट में यह लिखेंगे कि मकान नहीं बना, तो पूरा जिला डिफाल्टर हो जाएगा। कायदे से तो कागजों में पक्का मकान होने के बाद तुम्हारा इस तिरपाल में बैठना सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण है!”
व्यवस्था का सारा जादू यही है; वह इंसान को भूख और ठंड से मार देती है, लेकिन अपने डेटाबेस का स्वास्थ्य कभी खराब नहीं होने देती।
तभी तेज हवा का एक झोंका आया।
बांस की वह सड़ी हुई बल्ली एक चीख के साथ बीच से टूट गई। वह भीगा हुआ भारी तिरपाल सीधे कस्तूरी और उस मासूम बच्चे के ऊपर आ गिरा।
पानी के सैलाब ने उनके नीचे बिछी आखिरी सूखी बोरी को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया।
बिट्टू रो पड़ा, “दादी… ठंड लग रही है… हमें वो पीला मकान दे दो न जो साहब के फोन में चमक रहा था…”
कस्तूरी के पास उस वक्त अपने पोते को ढकने के लिए सिर्फ अपना बूढ़ा, कांपता हुआ जिस्म था। उसने बच्चे को अपने आंचल में समेटा और उस कीचड़ में घुटनों के बल बैठकर ऊपर उस काले आसमान को देखने लगी।
सर्वेयर की गाड़ी का सायरन बजा और वह धूल उड़ाती हुई लौट गई, क्योंकि सुबह की वर्चुअल रैली के लिए रिपोर्ट में ‘वेरिफाइड’ का हरा निशान लगाना बहुत जरूरी था।
और उस वीरान दलदल में, बारिश के पानी में डूबी कस्तूरी की पथराई आंखों से गिरे आंसू उस मटमैले कीचड़ में घुलकर खामोशी से बहते रहे।