प्रो. (डॉ.) बिभूति भूषण मलिक
कुलपति,
राजेंद्र विश्वविद्यालय, बलांगीर, ओडिशा
नुआखाई केवल एक पर्व नहीं है; यह पश्चिमी ओडिशा की मिट्टी, मनुष्य, कृषि, देवी-देवताओं, परिवार, समाज और सामूहिक चेतना का एक जीवंत प्रतिबिंब है। इस पर्व के अंतर्मन में मनुष्य और प्रकृति के संबंध की कथा है, श्रम और अन्न के रिश्ते की कहानी है, व्यक्ति और समाज के बीच आत्मीयता का सेतु है तथा अतीत और भविष्य के बीच एक नई राह बनाने का संदेश है। पश्चिमी ओडिशा के सामाजिक जीवन में नुआखाई का महत्व अत्यंत गहरा है। यह मूलतः एक सामुदायिक पर्व है, जहाँ ‘मैं’ से अधिक ‘हम’ का महत्व है। परिवार, पड़ोस, गाँव, समुदाय और विभिन्न सामाजिक समूह इस अवसर पर एक साझा भावबोध में बंध जाते हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो नुआखाई सामाजिक एकता, सामूहिकता, सामाजिक संहति और सामुदायिक चेतना को मजबूत करने वाला पर्व है।नुआखाई की सबसे अनूठी सामाजिक परंपराओं में से एक है—‘नुआखाई जुहार’।दैनिक जीवन में मनुष्य-मनुष्य के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है। कभी मन में खटास आती है, कभी संबंधों में दूरी पैदा होती है, कभी कोई बात मन को चोट पहुँचा देती है। यह मानव जीवन का स्वाभाविक पक्ष है। लेकिन नुआखाई आते ही जैसे मनुष्य अपने भीतर जमा पुराने आक्रोश, असंतोष और पीड़ा को पीछे छोड़कर संबंधों की ओर फिर से लौटता है। भाई बहन को, बहन भाई को, बड़े छोटों को और छोटे बड़ों को नए वस्त्र पहनकर जब ‘नुआखाई जुहार’ करते हैं, तब उस दृश्य में केवल एक परंपरा नहीं होती; उसमें एक गहरी मानवीय संवेदना छिपी होती है।‘जुहार’ केवल अभिवादन नहीं है। यह संबंधों की पुनर्स्थापना, मन के परिष्कार और नए जीवन का आह्वान है। कल क्या हुआ, किसने क्या कहा, किस बात से मन आहत हुआ—इन सबको अनंत समय तक ढोते रहना जीवन नहीं है। जीवन को आगे बढ़ना ही होता है। नुआखाई इसी सहज किंतु गहन जीवन-दर्शन का उत्सव है। इसलिए नुआखाई केवल नए अन्न का पर्व नहीं, बल्कि नई शुरुआत का पर्व भी है।
नए अन्न में नई आशा
नुआखाई की आत्मा कृषि और अन्न में बसती है। किसान का पसीना, मिट्टी की उर्वरता, वर्षा की कृपा और नए धान का आगमन—इन सबका सम्मिलित उत्सव है नुआखाई। वर्षा के आगमन के साथ खेतों में जीवन की एक नई कहानी शुरू होती है। किसान मिट्टी में बीज डालता है, श्रम करता है, प्रतीक्षा करता है और नई फसल की आशा करता है। महीनों की उस मेहनत और प्रतीक्षा के बाद जब नया अन्न घर तक पहुँचता है, तब नुआखाई उस कृषि-जीवन की सांस्कृतिक परिणति बनकर सामने आता है। नए धान से तैयार चूड़ा अथवा अन्य पारंपरिक खाद्य सामग्री को सबसे पहले देवी-देवताओं को अर्पित करने की परंपरा है। इसके पीछे एक अत्यंत सुंदर जीवन-दर्शन छिपा है—पहला अन्न केवल मनुष्य का नहीं, प्रकृति और ईश्वर का भी है। इस अर्पण में कृतज्ञता है। किसान समझता है कि उसकी फसल केवल उसके श्रम का परिणाम नहीं है। उसके पीछे मिट्टी है, पानी है, वर्षा है, सूर्य है, प्रकृति है और असंख्य लोगों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष श्रम है। इसलिए नए अन्न को सबसे पहले आराध्य देवी को अर्पित करना प्रकृति और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक लोकाचार है।
पटनागढ़ और बलांगीर क्षेत्र में माँ पाटनेश्वरी के समक्ष नए अन्न को अर्पित करने की परंपरा इस क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा है। इसी प्रकार संबलपुर क्षेत्र में माँ समलेश्वरी के समक्ष नए अन्न का अर्पण इस लोकविश्वास की विशिष्ट अभिव्यक्ति है। ढोल की ध्वनि, पारंपरिक रीति-रिवाज, अनुष्ठान और सामूहिक उल्लास नुआखाई को एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव में बदल देते हैं।
‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा
समाजशास्त्र की भाषा में नुआखाई एक प्रकार का सामूहिक उत्सव (कलेक्टिव सेलिब्रेशन) है, जिसमें सामूहिक अनुभूति व्यक्ति की निजी अनुभूति से बड़ी हो जाती है। इसी सामूहिकता से सामुदायिक भावना जन्म लेती है। व्यक्ति अनुभव करता है कि वह अकेला नहीं है; वह एक बड़े सामाजिक समुदाय का हिस्सा है। यही भावना किसी समाज को केवल व्यक्तियों का समूह होने से आगे ले जाकर एक जीवंत समुदाय में परिवर्तित करती है। इसलिए नुआखाई केवल घर का पर्व नहीं रह जाता। वह गाँव का पर्व बनता है, फिर क्षेत्र का और अंततः एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाता है।
लोकपरंपरा से व्यापक सांस्कृतिक पहचान तक
पश्चिमी ओडिशा की सांस्कृतिक विविधता की सबसे बड़ी विशेषताओं में उसकी समृद्ध लोकपरंपराएँ शामिल हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, देवी-देवताओं की आराधना, ग्रामीण अनुष्ठान, कृषि आधारित परंपराएँ और सामुदायिक उत्सव—इन सबने मिलकर इस क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान निर्मित की है।समाजशास्त्रीय दृष्टि से इन परंपराओं को लंबे समय तक स्थानीय समुदायों में विकसित हुई ‘लिटिल ट्रेडिशन’ के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन समय के साथ जब कोई स्थानीय परंपरा व्यापक समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाती है, तब उसका प्रभाव अपने मूल भौगोलिक क्षेत्र से कहीं आगे तक फैल जाता है। नुआखाई इस सांस्कृतिक यात्रा का एक अद्भुत उदाहरण है।
एक समय जो पर्व मुख्यतः पश्चिमी ओडिशा के ग्रामीण जीवन की आत्मीय अभिव्यक्ति था, आज वह व्यापक ओड़िया पहचान का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीक बनता जा रहा है।
जहाँ ओड़िया, वहाँ नुआखाई
आज नुआखाई केवल पश्चिमी ओडिशा के गाँवों तक सीमित नहीं है। शिक्षा, रोजगार, व्यापार और जीवन की अन्य आवश्यकताओं के कारण पश्चिमी ओडिशा के लोग देश के विभिन्न महानगरों में जा बसे हैं। अनेक लोग विदेशों में भी रह रहे हैं। लेकिन भौगोलिक दूरी ने उनकी सांस्कृतिक स्मृति को कमजोर नहीं किया है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, भुवनेश्वर जैसे शहरों से लेकर दुनिया के विभिन्न देशों तक नुआखाई मनाया जा रहा है। लोग एकत्रित होते हैं, नए अन्न का प्रसाद ग्रहण करते हैं, पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हैं और एक-दूसरे से कहते हैं—‘नुआखाई जुहार।’उस क्षण हजारों किलोमीटर की दूरी जैसे समाप्त हो जाती है। यह प्रमाण है कि संस्कृति की जड़ें भले ही धरती में होती हैं, लेकिन उसकी शाखाएँ आकाश तक फैल सकती हैं। मनुष्य अपनी जन्मभूमि से कितना भी दूर चला जाए, उसकी स्मृतियाँ, भाषा, परंपराएँ और सामूहिक पहचान उसे अपनी मिट्टी से जोड़े रखती हैं। शायद यही कारण है कि विदेश की धरती पर मनाया गया नुआखाई भी पश्चिमी ओडिशा की मिट्टी की वही खुशबू लेकर आता है।
बदलते समय में नुआखाई का संदेश
आज का समाज तेजी से बदल रहा है। जीवन अधिक व्यक्तिगत हो रहा है, परिवार छोटे हो रहे हैं, सामाजिक संबंधों का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हो गया है। हम एक-दूसरे से पहले की तुलना में अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन कई बार भावनात्मक रूप से अधिक दूर भी हो जाते हैं। ऐसे समय में नुआखाई का महत्व और बढ़ जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि संबंध केवल संपर्क का नाम नहीं है—संबंध एक अनुभूति है। समाज केवल लोगों की भीड़ नहीं है—समाज एक सामूहिक चेतना है।और उत्सव केवल मनोरंजन नहीं है—उत्सव वह क्षण है जब मनुष्य अपने भीतर और अपने आसपास के लोगों के बीच नए संबंधों का निर्माण करता है। नुआखाई हमें मिट्टी से जोड़ता है, किसान से जोड़ता है, प्रकृति से जोड़ता है, परिवार से जोड़ता है और सबसे बढ़कर—एक-दूसरे से जोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि श्रम का सम्मान करें, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहें, अपनी परंपराओं को जीवित रखें और रिश्तों में आई दरारों को भरने का प्रयास करें। सबसे महत्वपूर्ण बात—यह हमें अतीत के बोझ में दबे रहने के बजाय भविष्य की ओर देखने की प्रेरणा देता है।
नुआखाई : एक नई शुरुआत
नुआखाई के भीतर एक अत्यंत सरल लेकिन गहरा संदेश है—जीवन रुकता नहीं है। बीता हुआ कल चाहे जितना कठिन रहा हो, आज को फिर से शुरू किया जा सकता है। मन में कितनी भी पीड़ा क्यों न हो, संबंधों में फिर से आत्मीयता लाई जा सकती है। कितनी भी दूरी क्यों न हो, एक ‘जुहार’ उसे कम कर सकता है। इसीलिए नुआखाई में नया अन्न केवल खेत से नहीं आता; वह मन में भी उगता है। नए धान के साथ नई आशा जन्म लेती है। नए वस्त्रों के साथ नई ऊर्जा आती है। ‘जुहार’ के साथ पुराने संबंधों में नई ऊष्मा लौटती है। और सामूहिक उत्सव के साथ समाज में एक नई आत्मीयता का संचार होता है।
नुआखाई इसलिए पश्चिमी ओडिशा का केवल एक लोकपर्व नहीं है। यह माटी से मनुष्य तक, खेत से परिवार तक, परिवार से समाज तक और समाज से विश्वभर में फैले ओड़िया समुदाय तक पहुँचने वाली एक जीवंत सांस्कृतिक यात्रा है। आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तब नुआखाई हमें हमारी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है। वह कहता है—मिट्टी को मत भूलो।
किसान को मत भूलो।
अपनी भाषा को मत भूलो। अपनी परंपरा को मत भूलो।
और सबसे बढ़कर—अपने मनुष्य को मत भूलो। क्योंकि अंततः संस्कृति वही है जो हमें मनुष्य के रूप में बेहतर बनाती है।
‘नुआखाई जुहार’ में इसलिए केवल अभिवादन नहीं है। इसमें छिपा है क्षमा का भाव, संबंधों को फिर से जोड़ने का संकल्प, सामुदायिक जीवन की ऊष्मा और भविष्य को नए सिरे से गढ़ने की आशा।
नए अन्न की सुगंध हमारे जीवन में नई आशा लेकर आए।
हर घर में सुख हो।
हर संबंध में आत्मीयता हो।
समाज में सद्भाव और एकता हो।
और हमारी मिट्टी की यह अनूठी सांस्कृतिक सुगंध देश-विदेश में फैलती रहे। नया अन्न आए, नई आशा आए, नए संबंध बनें और जीवन फिर से मुस्कुराए,नुआखाई जुहार।