युवा भारत : कल, आज और कल पर विशेष व्याख्यान, मुकुल कानिटकर ने युवाओं को दिया प्रेरक संदेश

भोपाल,माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में शुक्रवार को ‘युवा भारत : कल, आज और कल’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी सभागार में हुए कार्यक्रम में प्रसिद्ध लेखक एवं शिक्षाविद् मुकुल कानिटकर मुख्य वक्ता रहे। कार्यक्रम के प्रारंभ में अंडमान एवं निकोबार से आई छात्रा सांची ने मुख्य वक्ता श्री मुकुल कानिटकर का अंग वस्त्र देकर स्वागत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने की। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष, शिक्षक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे।कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने मुख्य वक्ता सहित सभी विभागाध्यक्षों, शिक्षकों, स्टाफ और विद्यार्थियों का स्वागत किया। उन्होंने मुकुल कानिटकर के लंबे अनुभव और देशभर के युवाओं के साथ उनके संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि कानिटकर देश के विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 10 हजार से अधिक व्याख्यान दे चुके हैं और लाखों युवाओं से संवाद कर चुके हैं। कुलगुरु ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसे दिन आते हैं, जो बदलाव की शुरुआत करते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र के जीवन में भी कुछ घटनाएं दूरगामी परिवर्तन का आधार बनती हैं। उन्होंने कहा कि 11 सितंबर 1893 को शिकागो में स्वामी विवेकानंद का ऐतिहासिक संबोधन भारत की आध्यात्मिक चेतना और उसकी वैश्विक पहचान का महत्वपूर्ण क्षण था। उन्होंने विद्यार्थियों से इस अवसर को अपने जीवन में नई दिशा देने वाला अवसर बनाने का आह्वान किया।read more:https://pahaltoday.com/villagers-upset-over-garbage-dumping-staged-a-protest-at-the-district-collectorate/मुख्य वक्ता मुकुल कानिटकर ने अपने संबोधन की शुरुआत 11 सितंबर 1893 को शिकागो में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए ऐतिहासिक भाषण के संदर्भ से की। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने अपने विचार, व्यक्तित्व और आत्मीयता से विश्व के सामने भारत की आध्यात्मिक एवं सर्वसमावेशी दृष्टि को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के शिकागो संबोधन के प्रसिद्ध शब्द ‘मेरे अमेरिकी बहन एवं भाइयों’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इन शब्दों ने वहां मौजूद श्रोताओं पर गहरा प्रभाव डाला। सभागार में लंबे समय तक तालियां गूंजती रहीं। उन्होंने कहा कि यह संबोधन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि विश्व के सामने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को मजबूती से रखने वाला क्षण था।कानिटकर ने स्वामी विवेकानंद की अमेरिका यात्रा के दौरान आई कठिनाइयों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अमेरिका पहुंचने के बाद स्वामी जी को कई विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनका सामान चोरी हो गया, आर्थिक कठिनाइयां सामने आईं और जिस धर्मसभा में उन्हें शामिल होना था, उसकी तिथि भी आगे बढ़ गई। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहे।उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि स्वामी विवेकानंद का जीवन हमें विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास बनाए रखने, लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध रहने और संकल्प के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने युवाओं को अपने उद्देश्य को स्पष्ट रखते हुए देश और समाज के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का संदेश दिया।कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय की कुलसचिव प्रो. पी. शशिकला ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने मुख्य वक्ता मुकुल कानिटकर के प्रति विशेष धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि उनके विचार विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी और मार्गदर्शक हैं। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित सभी विभागाध्यक्षों, शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों का भी सफल आयोजन में सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। कुलसचिव ने विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता की सराहना की।

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