कसबे के उस सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बरामदे में लोहे की एक प्राचीन और महाकाय वजन मापने वाली मशीन ऐसे धरी थी जैसे किसी भ्रष्ट विभाग में पुरानी जाँच फाइलें दबी रहती हैं। उसका हरा रंग जगह जगह से इस तरह उखड़ चुका था जैसे किसी नेता के चेहरे से चुनाव जीतने के बाद नैतिकता का मुलम्मा उतर जाता है। उसका धुंधला डायल और सुई सत्य के उस सरकारी संस्करण की तरह थे जिसे जनता कभी साफ-साफ नहीं देख पाती। जब भी कोई कुपोषित मरीज उस मशीन के लोहे वाले पायदान पर खड़ा होता तो एक भारी कड़कड़ाहट की आवाज होती मानो कोई पुराना सामंती ढांचा दरक रहा हो और उसकी सुई झटके से बीस या तीस किलो के निशान पर जाकर ऐसे अटक जाती जैसे किसी क्लर्क की कलम रिश्वत के बिना अटक जाती है। उस अस्पताल के कोने में अपनी दवाइयों की फटी हुई पोटली सँभाले हरभजन काका रोज सुबह आठ बजे आकर ऐसे जम जाते थे जैसे किसी दफ्तर की कुर्सी पर बरसों से बैठा कोई निष्प्रयोजन अफसर बैठा हो। सफेद धोती-कुर्ता पहने और आँखों पर गोल चश्मा चढ़ाए काका का इकलौता महान राष्ट्रीय कर्तव्य उस मशीन के पायदान को कपड़े से पोंछना और दिन भर उस पर चढ़ने वाले नरकंकालों की संख्या को अपनी छोटी सी कॉपी में दर्ज करना था। गाँव के लोग जब भी अपनी बीमारी का मुफ्त मनोरंजन कराने अस्पताल आते तो काका को उसी बेकार तोलने वाली मशीन के पास तैनात पाते थे क्योंकि इस देश में हर बेकार वस्तु के संरक्षण के लिए एक निष्ठावान रक्षक पहले से तैयार रहता है। अस्पताल का नया कंपाउंडर जब भी मरीजों का बीपी नापने के लिए बाहर निकलता तो काका को उस जर्जर लोहे की खातिरदारी करते देख ऐसे अचरज में पड़ जाता जैसे कोई ईमानदार आदमी को देखकर चकित होता है। कंपाउंडर अक्सर काका पर व्यंग्य के बाण छोड़ते हुए पूछता कि काका इस घिसे-पिटे लोहे के तराजू में ऐसा कौन सा काला धन जड़ा हुआ है जो आप रोज इसकी धूल झाड़ते रहते हैं। हरभजन काका अपनी लाठी के सहारे सीधे खड़े होते और अपनी कांपती आवाज में मुस्कुराते हुए कहते कि बेटा इस मशीन का काम सिर्फ जिस्म का मांस नापना नहीं है बल्कि यह तो इंसान के वजूद और उसकी उस सच्चाई का वजन बताती है जिसे समझने का हुनर आधुनिक शिक्षा ने छीन लिया है।अस्पताल में हाल ही में नए डॉक्टर साहब के रूप में डॉक्टर प्रभात जी का पदार्पण हुआ था जो शहर के बड़े मेडिकल कॉलेज से किताबी ज्ञान की भारी गठरी लादकर आए थे और जिन्हें विदेशी मशीनों पर उतना ही भरोसा था जितना एक चापलूस को अपने आका की बातों पर होता है। डॉक्टर प्रभात जी जब भी अपने वातानुकूलित केबिन से बाहर निकलकर मरीजों की गरीबी देखने बरामदे में आते तो उनकी नजर सबसे पहले उस पुरानी और कबाड़ लग रही मशीन पर जाकर ऐसे टिक जाती जैसे किसी प्रगतिशील की नजर पुराने मंदिर के गुंबद पर टिकती है। एक दिन जब ओपीडी का समय खत्म हो गया और सरकारी आलस्य की धूप बरामदे में फैलने लगी तो डॉक्टर साहब सीधे हरभजन काका के पास पहुँचे। उन्होंने अपनी स्टेथोस्कोप को गले में ऐसे लपेट रखा था जैसे वह कोई प्रशासनिक फंदा हो और बहुत ही सख्त लहजे में पूछा कि काका आप रोज इस टूटी हुई मशीन के पास बैठकर समय की हत्या क्यों करते हैं जबकि इसका डायल सही वजन बताता ही नहीं है और इसकी सुई एक ही जगह पर लकवाग्रस्त हो चुकी है तो आप इसे यहाँ से हटाकर किसी कबाड़खाने में क्यों नहीं फिकवा देते जहाँ इसकी असली बिरादरी रहती है। हरभजन काका ने बहुत ही अदब से हाथ जोड़कर कहा कि डॉक्टर साहब यह मशीन कबाड़ नहीं बल्कि गवाह है क्योंकि जब इस अस्पताल की इमारत का शिलान्यास हुआ था तब से यह यहाँ गड़ी हुई है और इसने इस पूरे गाँव के हर इंसान की काया का भार और उसके शोषण की दास्तान अपने सीने पर झेली है। डॉक्टर प्रभात जी ने चिढ़कर कहा कि काका हम इक्कीसवीं सदी के डिजिटल इंडिया में जी रहे हैं जहाँ झूठ भी बहुत सफाई से बोला जाता है और मेरे कमरे में नई मशीन रखी है जो एक सेकेंड में सटीक ग्राम तक वजन बता देती है फिर इस लोहे के कबाड़ को यहाँ रखकर आप दफ्तर का रास्ता क्यों रोक रहे हैं।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/हरभजन काका ने डॉक्टर साहब की आधुनिक मूर्खता का बुरा नहीं माना बल्कि अपनी जेब से एक पुराना मुड़ा हुआ पन्ना निकालकर उनके सामने ऐसे फैला दिया जैसे कोई गरीब अपनी व्यथा का प्रार्थना पत्र फैलाता है। काका ने अपनी कांपती उँगलियों से उस पन्ने पर लिखे आंकड़ों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि डॉक्टर साहब आपकी डिजिटल मशीन तो केवल शरीर का मांस और हड्डियाँ तोलती है लेकिन यह पुरानी मशीन मन के उस बोझ को नापती है जिसे कोई कैमरा नहीं देख सकता। गाँव के कई लोग जो अपनी दवाइयाँ लेने आए थे वे सब काम छोड़कर डॉक्टर साहब और काका की बातचीत सुनने के लिए ऐसे इकट्ठा हो गए जैसे कहीं कोई दुर्घटना हुई हो। पास खड़े बुजुर्ग किसान मंगतू ने आगे आकर कहा कि डॉक्टर साहब काका बिल्कुल सच कह रहे हैं क्योंकि जब इस गाँव में भयंकर सरकारी सूखा पड़ा था और लोगों के पास खाने को दाना नहीं बचा था तब इसी मशीन पर चढ़कर गाँव वालों ने अपना घटता वजन नापा था और सत्ता को दिखाया था कि हम कितने खोखले हो चुके हैं मगर सत्ता तब भी बहरी थी और मशीन तब भी चीख रही थी। हरभजन काका ने मंगतू की बात को आगे बढ़ाते हुए बड़े ही भावुक लहजे में बोलना शुरू किया कि डॉक्टर साहब इस मशीन का एक अलिखित नियम है कि जब भी इस पर कोई ऐसा इंसान खड़ा होता है जो अंदर से बहुत दुखी होता है या जिसके साथ कोई घोर अन्याय हुआ होता है तो इसकी सुई कभी भी भौतिक वजन नहीं बताती बल्कि वह शून्य पर आकर रुक जाती है क्योंकि दुख का कोई वजन नहीं होता वह तो सिर्फ चेतना को सुन्न कर देता है। डॉक्टर प्रभात जी ने एक व्यंग्यात्मक ठहाका लगाया और बोले कि काका आप भी क्या कमाल का दार्शनिक अंधविश्वास फैला रहे हैं भला लोहे का निर्जीव सामान भी कभी इंसान के जज्बातों की भाषा समझ सकता है।डॉक्टर प्रभात जी ने अपनी वैज्ञानिक श्रेष्ठता का मुज़ाहिरा करने का फैसला किया और उन्होंने गाँव के एक भले-चंगे मजदूर सुखदेव को आवाज लगाई जो मुस्टंडा सा दिखता था और जिसकी आत्मा अभी तक शहरी हवा से प्रदूषित नहीं हुई थी। डॉक्टर साहब ने कड़े स्वर में कहा कि सुखदेव जरा तुम इस ऐतिहासिक मशीन पर चढ़कर दिखाओ तो सही कि तुम्हारी सुई शून्य पर जाती है या तुम्हारे सत्तर किलो के शरीर को स्वीकार करती है। सुखदेव मुस्कुराते हुए उस लोहे के पायदान पर जाकर खड़ा हो गया और जैसे ही वह चढ़ा एक कड़कड़ाहट के साथ सुई घूमकर सीधे सत्तर के निशान पर जाकर ऐसे रुक गई जैसे कोई अनुशासित सिपाही रुकता है। डॉक्टर प्रभात जी ने गर्व से अपनी छाती चौड़ी की और काका की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोले कि देखा काका यह मशीन केवल एक यांत्रिक औजार है जो गुरुत्वाकर्षण के नियम पर चलती है और आपकी बनाई हुई इन भावुक कहानियों का भौतिक विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। हरभजन काका ने शालीनता से सिर झुकाया और बोले कि डॉक्टर साहब सुखदेव तो अपनी मेहनत की ईमानदारी खाता है और उसका मन बिल्कुल कांच की तरह साफ है इसलिए मशीन ने उसका भौतिक वजन सही दिखाया लेकिन अगर कोई ऐसा इंसान इस पर चढ़े जो अपनी असलियत से भाग रहा हो या जिसने अपनों का ही हक मारा हो तो यह लोहा भी सच बोलने से नहीं चूकता क्योंकि धातु अक्सर इंसान से ज्यादा ईमानदार होती है। डॉक्टर प्रभात जी को यह अपनी विद्वत्ता की तौहीन महसूस हुई और उन्होंने अहंकार में कहा कि ठीक है तो कल मैं खुद इस मशीन पर चढ़कर आपका यह आखिरी आध्यात्मिक वहम भी मिट्टी में मिला दूँगा।अगले दिन सुबह से ही अस्पताल में एक अजीब सा कौतूहल फैला हुआ था और गाँव के लोग यह देखने के लिए जमा हो गए थे कि डॉक्टर साहब का अहंकारी विज्ञान जीतता है या हरभजन काका का मौन विश्वास। डॉक्टर प्रभात जी अपने सफेद कोट को सँभालते हुए बड़े ही रौब के साथ केबिन से बाहर निकले जैसे कोई बड़ा तानाशाह जनता को संबोधित करने निकला हो। काका अपनी पुरानी चटाई पर बैठे हाथ जोड़े प्रार्थना कर रहे थे मानो किसी अंतिम सत्य का इंतजार हो। डॉक्टर साहब ने चारों तरफ खड़े लोगों पर एक विजेता जैसी हेय नजर डाली और कहा कि आज मैं साबित कर दूँगा कि पढ़े-लिखे इंसान के तर्क के सामने ऐसी पुरानी दकियानूसी सोच कभी टिक नहीं सकती और रूढ़ियों का वजन हमेशा शून्य होता है। डॉक्टर प्रभात जी बड़े आत्मविश्वास के साथ उस लोहे के पायदान पर चढ़े लेकिन जैसे ही उनके पॉलिश किए हुए जूतों का दबाव पड़ा मशीन के अंदर से एक अजीब सी विलाप जैसी खड़खड़ाहट हुई और डायल की सुई घूमी। सब लोग आँखें फाड़े देख रहे थे कि सुई सत्तर या अस्सी पर जाने के बजाय अचानक उल्टी दिशा में घूमी और सीधे जाकर शून्य के निशान पर ऐसे आघात करके रुक गई जैसे किसी ने जोरदार तमाचा मारा हो। डॉक्टर प्रभात जी का चेहरा अचानक पीला पड़ गया और वे ऐसे कांपने लगे जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी रंगे हाथों पकड़ा गया हो। उन्होंने झटके से उतरकर फिर से चढ़ने की कोशिश की लेकिन सुई फिर से उस भयावह शून्य पर ही टिकी रही मानो कह रही हो कि यहाँ इंसान तो है मगर इंसानियत का वजन नदारद है।डॉक्टर प्रभात जी गुस्से और आत्मग्लानि की बोखलाहट में चिल्लाने लगे कि यह मशीन पूरी तरह खराब है और काका ने कोई तकनीकी चालाकी करके इसे जाम कर दिया है ताकि मेरा अपमान हो सके। हरभजन काका अपनी लाठी टेकते हुए धीरे-धीरे खड़े हुए और उन्होंने डॉक्टर साहब के कांपते ठंडे हाथों को अपने हाथों में ऐसे थाम लिया जैसे कोई बूढ़ा दरख्त गिरती हुई दीवार को थामता है। काका की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी और उन्होंने रुँधे गले से कहा कि डॉक्टर साहब यह मशीन खराब नहीं है बल्कि यह तो उस सच को उगल रही है जिसे आप पिछले पाँच सालों से अपने महंगे कोट के नीचे दबाकर जी रहे हैं। डॉक्टर साहब स्तब्ध होकर काका का चेहरा ताकने लगे जैसे कोई अपराधी अपनी चार्जशीट पढ़ रहा हो। काका ने रोते हुए अपनी जेब से एक पुराना पीला पड़ चुका मुड़ा हुआ लिफाफा निकाला और बोले कि डॉक्टर साहब पाँच साल पहले जब आप शहर के बड़े अस्पताल में मेडिकल की पढ़ाई का नाटक कर रहे थे तो आपके गाँव के जिस बूढ़े किसान पिता ने अपनी आखिरी ज़मीन और अपनी हड्डियाँ बेचकर आपकी फीस भरी थी वह अभागा पिता कोई और नहीं बल्कि मैं ही था। काका ने बिलखते हुए अपनी बात पूरी की कि तुमने साहब बनने के बाद मुझे अनाथालय भिजवाने का जो क्रूर फॉर्म इसी अस्पताल के पते पर भेजा था उसे मैंने इसी मशीन के नीचे छुपा कर रखा था और उस पर आज तक अपने दस्तखत नहीं किए थे ताकि इस गाँव को कभी यह न पता चले कि उनका यह महान डॉक्टर साहब अपनी ही मिट्टी और अपने ही बाप का वजन भूल चुका है। डॉक्टर प्रभात जी के पैरों तले जमीन खिसक गई और वे सुन्न होकर अपने ही बाप के कदमों में गिर पड़े जबकि पूरे अस्पताल का परिसर उस बेबस बाप की सिसकियों और आधुनिकता के इस खोखलेपन के शोर से दहल उठा।