अजय कुमार
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक बेहद खामोश लेकिन गहरा वैचारिक बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसकी धुरी समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया अखिलेश यादव के इर्द-गिर्द घूम रही है। पारंपरिक रूप से ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के दम पर सत्ता के शिखर तक पहुँचने वाली समाजवादी पार्टी की हालिया रणनीतियों को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच यह सवाल तैर रहा है कि क्या अखिलेश यादव को हिंदू वोटरों की नाराजगी का डर सताने लगा है? यह सवाल बेवजह नहीं है। पिछले कुछ समय से अखिलेश यादव और उनकी पार्टी का रुख उन मुद्दों पर बेहद नपा-तुला और रक्षात्मक रहा है, जो कभी उनके मुख्य वोट बैंक यानी मुस्लिम समुदाय से सीधे जुड़े माने जाते थे। मुस्लिम समाज के कई कार्यक्रमों से दूरी बनाना, संवेदनशील सांप्रदायिक या समुदाय-विशेष के मुद्दों पर तीखे बयानों के बजाय चुप्पी साध लेना या बेहद सामान्य प्रतिक्रिया देना, इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी अपनी पुरानी ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ वाली छवि से पीछा छुड़ाना चाहती है। अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल में अगर बहुसंख्यक हिंदू समाज में यह संदेश गया कि सपा केवल एक खास वर्ग की राजनीति करती है, तो वोटों का भारी नुकसान तय है। 2014 के बाद से देश और प्रदेश की राजनीति में जो ‘कम्युनल कंसोलिडेशन’ यानी बहुसंख्यक वोटों का एकतरफा झुकाव भाजपा की तरफ हुआ है, उसने विपक्षी दलों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। इसी का नतीजा है कि अखिलेश यादव अब अपनी छवि को सॉफ्ट हिंदुत्व और सर्वसमावेशी ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के लिफाफे में लपेटकर पेश कर रहे हैं, जिसमें अल्पसंख्यक (मुस्लिम) सिर्फ एक हिस्सा हैं, न कि पूरी राजनीति का केंद्र बिंदु।इस रणनीतिक बदलाव का सीधा असर मुस्लिम समुदाय के भीतर महसूस किया जा रहा है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों और आम वोटरों का एक बड़ा धड़ा अब खुलकर यह कहने लगा है कि समाजवादी पार्टी संकट के समय उनके साथ खड़ी नहीं दिखती। चाहे वह दंगों या विवादों के बाद की कानूनी कार्रवाइयां हों या फिर समुदाय से जुड़े अन्य भावनात्मक मुद्दे, अखिलेश यादव की सधी हुई चुप्पी ने इस पारंपरिक वोट बैंक के भीतर एक असुरक्षा और उपेक्षा का भाव भर दिया है। इसी खालीपन का फायदा उठाने के लिए ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार सक्रिय हैं। ओवैसी जनसभाओं में बार-बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि अब वह समय चला गया, जब ‘अखिलेश मुख्यमंत्री बनेंगे और अब्दुल्ला दरी बिछाएगा’। ओवैसी का यह तंज सीधे तौर पर मुस्लिम समाज की उस राजनीतिक चेतना को झकझोरता है, जो खुद को सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ के रूप में इस्तेमाल होते देखकर थक चुकी है। ओवैसी की यह दलील मुस्लिम युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर रही है, जो अब केवल भाजपा को हराने के नाम पर सपा को एकतरफा वोट देने की मजबूरी से बाहर निकलना चाहते हैं। हालांकि, ओवैसी पर अक्सर भाजपा की ‘बी-टीम’ होने का आरोप लगता है और उनका वोट बैंक सीमित है, लेकिन यदि वह मुस्लिम वोटों में पांच से दस प्रतिशत की भी सेंधमारी करने में कामयाब रहे, तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के लिए सत्ता की राह बेहद मुश्किल हो जाएगी।राजनीति की इस बिसात पर केवल ओवैसी ही अखिलेश यादव की मुश्किलें नहीं बढ़ा रहे हैं, बल्कि पर्दे के पीछे एक और बड़ा बदलाव आकार ले रहा है। मुस्लिम समुदाय का एक ऐसा धड़ा भी सामने आ रहा है, जो भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की विकासवादी नीतियों से प्रभावित नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं, जैसे- मुफ्त राशन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत कार्ड का लाभ बिना किसी भेदभाव के मुस्लिम आबादी के एक बड़े हिस्से तक पहुँचा है। इस ‘लाभार्थी वर्ग’ के भीतर एक नया राजनीतिक दृष्टिकोण जन्म ले रहा है। सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिलने से मुस्लिम महिलाओं और गरीब तबके में एक सुरक्षा और संतुष्टि का भाव आया है। भले ही यह वोटर सार्वजनिक रूप से या सामाजिक दबाव के कारण भाजपा का झंडा लेकर मैदान में न उतरे, लेकिन वोटिंग के दिन ईवीएम का बटन दबाते समय यह वर्ग ‘साइलेंट वोटिंग’ के जरिये भाजपा के पक्ष में खड़ा हो सकता है। यह सच है कि भाजपा के कोर एजेंडे और उसकी विचारधारा के कारण मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा उससे दूरी बनाए रखता है, लेकिन लाभार्थियों का यह नया साइलेंट ग्रुप अगर दो से चार प्रतिशत भी भाजपा की तरफ शिफ्ट होता है, तो वह सपा के पारंपरिक गणित को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।read more:https://khabarentertainment.in/call-to-embrace-dr-syama-prasad-mookerjees-ideas-bjp-organizes-an-ideological-seminar/अखिलेश यादव की इस नई रणनीति को राजनीतिक विश्लेषक एक सोची-समझी मजबूरी मानते हैं। अखिलेश जानते हैं कि केवल मुस्लिम और यादव वोटों के सहारे उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनाई जा सकती। उन्हें गैर-यादव ओबीसी और सवर्णों के एक हिस्से का समर्थन हर हाल में चाहिए। यही कारण है कि वह खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो सभी वर्गों की बात करता है। वह मंदिरों के चक्कर लगाते हैं, हिंदू त्योहारों की शुभकामनाएं प्रमुखता से देते हैं, लेकिन साथ ही मुस्लिम मंचों पर जाने से कतराते हैं, ताकि बहुसंख्यक समाज में कोई गलत संदेश न जाए। लेकिन इस ‘संतुलन बनाने की कला’ में वह एक पतली रस्सी पर चल रहे हैं। यदि मुस्लिम वोटरों को यह यकीन हो गया कि समाजवादी पार्टी उन्हें केवल टेकन फॉर ग्रांटेड (यानी सुरक्षित मानकर उपेक्षित) ले रही है, तो वे अन्य विकल्पों की तलाश तेज कर देंगे। कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होना और बसपा का अपना वजूद बचाने की लड़ाई लड़ना भी मुस्लिम वोटों के बिखराव का कारण बन सकता है। ऐसे में, यदि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों का बिखराव ओवैसी, कांग्रेस और भाजपा के साइलेंट वोटर्स के रूप में हो गया, तो समाजवादी पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है और अखिलेश यादव की ‘हिंदू नाराजगी से बचने’ की यह कवायद उनके अपने ही सबसे मजबूत किले को ढहाने का कारण बन सकती है।