कजरी रे कजरी.. यह क्या हो गया

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
किचन के काले पड़ चुके बर्तनों को चमकाने वाली कजरी आज खुद राख जैसी मटमैली लग रही थी। सुनील ने जब अपनी खिड़की से देखा तो वह एक फटे हुए बोरे की तरह आँगन के कोने में ढह गई थी। उसकी आँखों का पानी मर चुका था और होठों पर अजीब सी पपड़ी जमी थी। शहर में जब भी कोई बड़ी गाड़ी आकर रुकती तो कजरी के भीतर का कौतुक जाग जाता था लेकिन आज उसके घुटने छाती से सट गए थे। सुनील ने चाय का कुल्हड़ हाथ में लिया और उसकी तरफ बढ़ गए क्योंकि उन्हें कजरी की यह खामोशी भीतर तक चीर रही थी। उन्होंने कजरी के सर पर हाथ रखने की कोशिश की तो उसने बिजली के झटके की तरह खुद को समेट लिया। सुनील ने गहरी सांस लेकर पूछा कि कजरी बेटी आज यह बर्तन अनाथ क्यों पड़े हैं और तुम्हारी इस देह का सारा नूर कहाँ विलीन हो गया है। कजरी ने अपनी सूजी हुई आँखें उठाईं और सुबकते हुए कहा कि बाबूजी इस संसार में जब पुरुषोत्तम जैसे लोग पूजे जाते हैं तब हम जैसी चिड़ियों के पर कतर दिए जाते हैं। वह पुरुषोत्तम जिसके नाम के आगे मर्यादा लिखी है उसकी कोठरी के भीतर रोज एक नया नर्क जन्म लेता है जहाँ ताजी कलियों को मसलकर मदिरा के प्याले भरे जाते हैं। सुनील को लगा कि कजरी की जुबान से निकला एक एक शब्द समाज के चेहरे पर जलता हुआ तेजाब फेंक रहा है। उनके भीतर का लेखक छटपटा उठा क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इस छोटे से कस्बे की सबसे हंसमुख लड़की के भीतर कोई गहरी नदी डूब चुकी है।
कजरी की बातें सुनकर सुनील का कलेजा मुंह को आने लगा और उन्होंने कजरी का हाथ थामकर उसे ढांढस बंधाने का असफल प्रयास किया। आँगन में धूप अब कड़वी होने लगी थी और कजरी के आंसू उस सूखी मिट्टी में गिरकर तुरंत गायब हो रहे थे जैसे गरीब की दुआएं इस आसमान में खो जाती हैं। कजरी ने अपने फटे हुए आंचल को समेटते हुए कहा कि बाबूजी कल रात जब पूरा शहर मीठी नींद सो रहा था तब पुरुषोत्तम की हवेली की बत्तियां चीख रही थीं। वहां बड़े बड़े साहब लोग आते हैं और उनकी गाड़ियों के पहिये हमारी रीढ़ की हड्डी को कुचलकर आगे बढ़ जाते हैं। मुझे कहा गया था कि वहां जाकर केवल जूठे बर्तन समेटने हैं लेकिन जब मैं भीतर गई तो मुझे लगा कि मैं किसी श्मशान में आ गई हूँ जहाँ जिंदा रूहों का व्यापार होता है। सुनील ने पूछा कि कजरी तुमने वहां ऐसा क्या देख लिया जिसने तुम्हारी रूह को इस कदर झकझोर दिया है और तुम इस तरह थरथर कांप रही हो। कजरी ने कांपती उंगलियों से आसमान की तरफ इशारा किया और बोली कि बाबूजी वहां कानून के rक्षक ही भक्षक बनकर बैठे थे और जो तिजोरी की चाबी है वह पुरुषोत्तम के तकिये के नीचे दबी रहती है। समाज का यह कैसा व्यंग्य है कि जिसके नाम में ही उत्तम छुपा है वह भीतर से इतना कलुषित और भयावह हो सकता है। सुनील को महसूस हुआ कि कजरी केवल अपनी पीड़ा नहीं रो रही थी बल्कि वह इस पूरे तंत्र की सड़न को अपने आंसुओं से धोना चाह रही थी जो कभी धुल नहीं सकती।
हवा में एक अजीब सी मनहूसियत तैर रही थी और सुनील की चाय अब पूरी तरह ठंडी होकर अपनी रंगत खो चुकी थी। कजरी ने अपनी फटी हुई साड़ी के छोर से चेहरा छिपाया और फिर एक ऐसी बात कही जिसने सुनील के पैरों तले की जमीन खिसका दी। कजरी ने रोते हुए कहा कि बाबूजी आपको क्या लगता है कि जो लड़कियां वहां रोज आती हैं वे अपनी मर्जी से इस दलदल में पैर रखती हैं। गांव की भोली चिड़ियों को अच्छे काम का लालच देकर इस पिंजरे में बंद किया जाता है और फिर गिद्धों की तरह उनकी अस्मत को नोचा जाता है। वहां बड़े बड़े नेता और अफसर सलाम बजाते हैं क्योंकि उनकी किस्मत के फैसले उसी बंद कमरे की काली रातों में लिखे जाते हैं। सुनील ने कजरी को सांत्वना देते हुए कहा कि बेटी तुम घबराओ मत हम पुलिस के पास चलेंगे और इस घिनौने सच का पर्दाफाश करेंगे ताकि तुम्हें न्याय मिल सके। कजरी इस बात पर कड़वाहट से हंस पड़ी और उसकी हंसी में जो दर्द था वह किसी भी संवेदनशील इंसान के कलेजे को छलनी करने के लिए काफी था। कजरी ने कहा कि बाबूजी आप किस पुलिस की बात करते हैं जो खुद उस पुरुषोत्तम के दरवाजे पर पहरा देती है ताकि भीतर चल रहे पाप की भनक बाहर किसी को न लग सके। इस व्यवस्था की आंखें तो उसी दिन फूट गई थीं जिस दिन पहली बार किसी असहाय लड़की की चीख को पैसों की खनक के नीचे दबा दिया गया था।read more:https://khabarentertainment.in/prof-dr-rajendra-rajput-receives-guru-shree-2026-award-at-national-level-brings-honour-to-ghazipur/रहस्य का कुहासा अब और गहरा होता जा रहा था क्योंकि सुनील को समझ नहीं आ रहा था कि कजरी इस सबमें इतनी गहराई से कैसे जुड़ गई। उन्होंने बहुत ही कोमल स्वर में पूछा कि कजरी तुम वहां बर्तन मांजने गई थीं तो फिर तुम्हारे भीतर यह आक्रोश और यह जानलेवा भय अचानक कहाँ से आ गया। क्या पुरुषोत्तम ने तुम्हारे साथ भी कोई दुराचार करने का दुस्साहस किया है जिसके कारण तुम्हारी यह दशा हुई है। कजरी ने अपना सिर जोर जोर से हिलाया और उसकी आंखों से खून के आंसू बहने लगे जो उसके गालों की धूल को काटते हुए नीचे गिर रहे थे। उसने कहा कि बाबूजी मेरी किस्मत तो पहले से ही फूटी थी लेकिन कल रात जो आहुति उस हवन कुंड में दी गई वह मेरी अपनी कोख से जन्मी थी। मेरी छोटी बेटी मुनियां जो अभी ठीक से बोलना भी नहीं सीखी थी उसे कल शाम शहर घुमाने के बहाने वो लोग ले गए थे। सुनील का पूरा बदन जड़ हो गया और उन्हें लगा कि उनके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया गया हो क्योंकि इस भयानक सच की उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। कजरी ने अपनी छाती पीटते हुए कहा कि बाबूजी मुझे लगा था कि बड़ी हवेली के लोग दयालु होते हैं और वो मेरी मुनियां को नया फ्रॉक दिलाएंगे पर वो तो कसाई निकले।पार्क के कोने में लगे बूढ़े बरगद की पत्तियां भी इस करुण क्रंदन को सुनकर जैसे सहम गई थीं और हवा का चलना बिल्कुल बंद हो गया था। सुनील ने कांपते हुए कजरी के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और रुंधे हुए गले से पूछा कि कजरी फिर मुनियां कहाँ है और वह वापस क्यों नहीं आई। कजरी ने अपनी फटी हुई साड़ी की गिरह खोली और उसमें से एक छोटा सा चांदी का कड़ा निकालकर सुनील की हथेली पर रख दिया। यह वही कड़ा था जिसे सुनील ने मुनियां के जनमदिन पर उसे बहुत चाव से पहनाया था और उसकी खनक पूरे मोहल्ले में गूंजती थी। कजरी ने हिचकी लेते हुए कहा कि बाबूजी मुनियां अब इस दुनिया के झंझटों से आजाद हो गई है और वह पुरुषोत्तम के कमरे के पीछे वाले कुएं में सो रही है। उन्होंने कहा कि लड़की बीमार थी और अचानक शांत हो गई इसलिए उसे वहां दफन कर दिया गया ताकि बदनामी न हो। सुनील की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा और उन्हें लगा कि उनका लेखक होना और समाज सुधार की बातें करना सब एक ढोंग मात्र था। इस पूरे तंत्र के ऊपर यह इतना तीखा और मार्मिक व्यंग्य था कि शब्द भी अपनी सार्थकता खोकर कजरी के पैरों में दम तोड़ रहे थे।सुनील ने उस चांदी के कड़े को अपनी छाती से लगा लिया और उनका रोना अब एक चीख में तब्दील हो चुका था जिसे सुनने वाला कोई नहीं था। कजरी ने अचानक अपनी आँखें मूंद लीं और वह बिल्कुल शांत हो गई जैसे उसके भीतर की बची खुची सांस भी मुनियां को ढूंढने के लिए निकल गई हो। समाज के ठेकेदार अपनी गाड़ियों में घूमते रहे और पुरुषोत्तम का कमरा आज भी उसी तरह सज रहा था जहाँ नई कलियों की खुशबू का सौदा होना था। सुनील ने कजरी के ठंडे पड़ते शरीर को देखा और आसमान की तरफ देखकर पूछा कि इस न्याय के मंदिर में आखिर कब तक कजरियों और मुनियां की बलियां चढ़ती रहेंगी। इस मार्मिक अंत ने पूरे कस्बे की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था और हर कोई अपनी लाचारी पर आंसू बहाने के अलावा कुछ भी करने में असमर्थ महसूस कर रहा था। यह कहानी समाप्त होकर भी समाज के माथे पर एक ऐसा कलंक छोड़ गई जिसे कोई भी कानून और कोई भी व्यवस्था कभी साफ नहीं कर पाएगी।

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