डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
घर के उस उजड़े हुए उसारे में जहाँ बारात के बाद का कबाड़ और टूटी कुर्सियाँ अपना बुढ़ापा काटती हैं वहीं वह अपनी अंतिम साँसें गिन रही थी। वह जो कभी पूरे घर की इज्जत को अपने सीने से बुहारकर चमकाती थी आज खुद एक फटे चीथड़े की तरह दीवार के सहारे दुबकी पड़ी थी। उसकी सींकें ऐसे बिखरी थीं जैसे किसी अधेड़ बाप की ढहती हुई उम्मीदें हों। ठीक मेरे जैसी हालत थी उसकी। जब तक रीढ़ में दम था घर भर का कूड़ा ढोते रहे सबको साफ-सुथरा कोना देते रहे और जब खुद की रीढ़ टूट गई तो कोने की कालिख ने हमें अपनी गोद में समेट लिया। दुनिया का दस्तूर भी यही है कि जब तक तुम किसी के काम के हो तब तक तुम चौखट के देवता हो और काम निकलते ही तुम उसी चौखट के बाहर फेंके जाने वाले कबाड़ बन जाते हो। वह धूल से सनी हुई सींकें देखकर मुझे अपना ही बीता हुआ कल याद आ रहा था जब लोग पैर छूते थे और आज पैर मार कर आगे बढ़ जाते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/tree-plantation-and-environmental-conservation-program-organized-by-wwf-india/रात के सन्नाटे में जब पूरा घर मखमली गद्दों पर सो रहा था तब उस कोने से एक अजीब सी सरसराहट गूँज उठी। ध्यान से सुना तो वह कोई रोना नहीं था बल्कि एक सूखी सींक का दूसरी टूटी सींक से टकराने का सन्नाटा था। मैंने खिड़की से झाँककर देखा तो मालकिन हाथ में एक चमचमाता हुआ प्लास्टिक का वैक्यूम क्लीनर लिए खड़ी थीं। उन्होंने उस पुरानी जर्जर सींकों के बंडल को पैर से ढकेला और एक झटके में कूड़े वाली गाड़ी में फेंक दिया। जाते-जाते वह झाड़ू अपनी बची-खुची धूल मेरे चेहरे पर छोड़ गई जैसे कह रही हो कि आज मेरी बारी है कल तुम्हारी होगी। तभी अंदर से मालकिन की तेज आवाज आई।”अरे सुनो जी अब इस बूढ़े नौकर को भी हटाओ बहुत कचर कचर करता है घर में जगह घेर रखी है”यह सुनकर मेरे पाँव तले की जमीन खिसक गई क्योंकि वह झाड़ू तो चली गई थी पर जाते-जाते वह मेरी ही नियति का आईना मेरे सामने छोड़ गई थी।