अशोक भाटिया
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी कलह और बगावत के कारण दो फाड़ होने की अटकलें तेज हो गई हैं। बताया जाता है कि इस करारी शिकस्त के बाद मंथन करने के लिए टीएमसी ने तीन बार बैठक बुलाई। 6 मई को बैठक बुलाई गई तो 10 विधायक पहुंचे ही नहीं। फिर 19 मई को बैठक बुलाई गई तो 35 विधायक नदारद रहे। उसके बाद 31 मई को बुलाई गई बैठक में तो सबसे बड़ा खेल हुआ और 80 में से 60 विधायक मीटिंग में पहुंचे ही नहीं। उसके बाद से ममता की टीएमसी में इस्तीफों की झड़ी भी लग चुकी है। टीएमसी प्रवक्ता बिस्वजीत देब ने इस्तीफा दिया है। शांतनु सिंह, अभिजीत मजूमदार, काकोली घोष और अरुप चक्रवर्ती ने भी अपना पद छोड़ दिया है। इसके अलावा डायमंड हार्बर से 8 पार्षदों का इस्तीफा हुआ है। चंदननगर से 30 पार्षद, भाटपाड़ा से 30, गारुलिया से 18, हलिशहर से 16, उत्तर बैरकपुर से 15 और कांचरापाड़ा से 14 पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं। यही नहीं इन इस्तीफों के अलावा ममता बनर्जी ने उलूबेरिया से विधायक ऋतब्रत बनर्जी और एंटाली से विधायक संदीपन साहा को निष्कासित कर दिया। आरोप लगा कि दोनों पार्टी विरोधी गतिविधियों में सक्रिय थे। लेकिन असल विवाद यह था कि इन दोनों ही विधायकों ने नेता प्रतिपक्ष से जुड़े प्रस्ताव और उस पर लिए गए हस्ताक्षरों की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। संदीपन साहा तो यहां तक कह चुके थे कि इसमें ऐसे विधायकों के हस्ताक्षर भी शामिल हैं जो असल में बैठक में शामिल तक नहीं हुए थे। इन आरोपों के बाद ही दोनों विधायकों को निष्कासित कर दिया गया। विधायकों का नदारद होना, कुछ को निष्कासित कर देना और लगातार इस्तीफों का सिलसिला इस बात की ओर जरूर इशारा करता है कि टीएमसी में इस समय सब कुछ ‘ऑल इज वेल’ नहीं है। मीडिया में आई एक रिपोर्ट की अनुसार कोलकाता के ‘विधायक हॉस्टल’ में टीएमसी नेताओं की एक सीक्रेट बैठक हो चुकी है। इस बैठक में निष्कासित विधायक के साथ-साथ कई असंतुष्ट नेता शामिल हुए और टीएमसी के भविष्य, संगठनात्मक बदलाव और नए राजनीतिक विकल्पों को लेकर चर्चा की गई। अब इस समय पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी के कई विधायक मीडिया के सामने आकर अभिषेक बनर्जी की नीतियों की खुले तौर पर आलोचना कर रहे हैं, तो कुछ दबी जुबान ममता बनर्जी की कार्यशैली पर भी सवाल उठा रहे हैं। इसी वजह से ऐसी अटकलें चल पड़ी हैं कि क्या 80 में से नदारद रहे 60 विधायक पार्टी को तोड़ भी सकते हैं?अभी इस सवाल का जवाब तो भविष्य की गर्भ में छिपा है, लेकिन ममता बनर्जी ने खतरे को भांपते हुए सड़क पर उतरने का फैसला किया है। उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों को लेकर उन्होंने आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। कोलकाता पुलिस ने उन्हें इजाजत नहीं दी है, लेकिन ममता ने भी तेवर दिखाते हुए दिल्ली कूच करने की चेतावनी दे दी है।read more:https://pahaltoday.com/allegations-of-non-availability-of-records-under-the-right-to-information-act-complaint-made-to-the-chief-minister/यहां समझने वाली बात यह है कि सड़क पर उतरी ममता बनर्जी की असल पहचान भी यही है। जानकार मानते हैं कि ममता बनर्जी की एक स्ट्रीट फाइटर की इमेज है। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों ने उनकी छवि को मजबूत भी किया था। उन आंदोलनों के दम पर 34 साल के वामपंथी राज को भी खत्म किया गया था।लेकिन तब की स्थिति और आज की स्थिति में बड़ा फर्क है। जब लेफ्ट से लड़ाई चल रही थी तब ममता की टीएमसी एकजुट थी। शुभेंदू अधिकारी जैसे बड़े नेता भी ममता के साथ खड़े थे। लेकिन आज की चुनौतियां और आज का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। बंगाल में बीजेपी की सरकार है, टीएमसी के कई विधायक ममता और अभिषेक से नाराज बताए जा रहे हैं, पार्टी के अंदर ओल्ड बनाम यंग गार्ड की लड़ाई छिड़ चुकी है और लगातार हो रहे इस्तीफे सियासी तापमान बढ़ा रहे हैं।ममता की सड़क पॉलिटिक्स क्या एक बार फिर टीएमसी को खड़ा कर पाएगी? इस सवाल का जवाब ही टीएमसी का भविष्य भी तय करेगा और ममता दीदी की आगे की रणनीति भी। बागी विधायकों द्वारा पार्टी से निष्कासित नेताओं के नेतृत्व में एक अलग गुट बनाकर ‘असली टीएमसी’ का दावा करने और महाराष्ट्र जैसी राजनीतिक स्थिति पैदा होने की चर्चा है।दरअसल ममता बनर्जी ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विधानसभा में नेता विपक्ष बनाया है। इस नियुक्ति को लेकर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को आरोप लगाया कि स्पीकर को भेजे गए लेटर पर कुछ टीएमसी विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर थे। इतना ही नहीं सीएम ने टीएमसी के दो विधायकों रिताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा का नाम भी लिया, जिन्होंने इसको लेकर जालसाजी की शिकायत की। मुख्यमंत्री के आरोपों के बाद ममता बनर्जी ने इन शिकायत कर्ता दोनों विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोपों में बाहर निकाल दिया।टीएमसी से निकाले गए विधायक संदीपन साहा ने इस मामले के लिए अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराते है और कहते है कि पार्टी के जनरल सेक्रेटरी ने ही MLA की लिस्ट पर साइन किए थे। मड़िया के सूत्रों के हवाले से बताया कि नाराज टीएमसी विधायकों को मनाने के लिए और सदन में पार्टी को एकजुट बनाए रखने के लिए कोलकाता में जोरदार मीटिंग चल रही हैं। अब देखना होगा कि ममता बनर्जी टीएमसी को किस तरह एकजुट रख पाएंगी। फर्जी साइन का मामला सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल CID ने जांच शुरू कर दी है। इस मामले में कई तृणमूल नेताओं को नोटिस भेजा गया है। CID ने अभिषेक बनर्जी को पूछताछ के लिए बुलाया भी था। हालांकि वह सीआईडी के समन पर नहीं गए थे। दरअसल अब चुनाव हारने के बाद से टीएमसी अपने नेताओं को एकजुट रखने के लिए संघर्ष कर रही है। ममता बनर्जी की कुर्सी जाने के बाद कई नेताओं ने खुलकर नाराजगी जाहिर की है। पार्टी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने तो जिलाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। तृणमूल कांग्रेस के हालात पर मजाक उड़ाते हुए सीनियर भाजपा नेता और शुभेंदु सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने कहा, ‘सभी लोग पार्टी छोड़कर जा रहे हैं, लग रहा है कि अब केवल ममता बनर्जी और उनके भतीजे ही पार्टी (टीएमसी) में बचेंगे। ‘रिजू दत्ता का दावा है कि कि 80 में से 50 से ज्यादा विधायक खुद को असली तृणमूल बताने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये सभी विधायक विधानसभा स्पीकर के पास जाएंगे और तीन मुद्दे उठाएंगे। पहला- हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है 50 विधायक हमारे साथ हैं। हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं। दूसरा, विपक्ष के नेता ऋतब्रत होंगे, न कि शोभनदेव। तीसरा, हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है, इसलिए चुनाव चिह्न हमारा होना चाहिए।अगर बात करें तो टीएमसी के कमजोर होने का सीधा फायदा भाजपा को मिलता नजर आ रहा है। अगर टीएमसी एकजुट रही तो ममता ताकतवर बनी रहेंगी। ऐसे में वह फिर से पार्टी को सत्ता में ला सकती हैं। इतना ही नहीं, बतौर मजबूत विपक्ष भी वह भाजपा की सरकार को लगातार चुनौती दे सकती हैं। लेकिन अगर टीएमसी दो-फाड़ हो जाती है तो ऐसे में भाजपा के लिए चीजें काफी आसान हो जाएंगी। भाजपा को सीधे चुनौती नहीं मिलेगी। ममता इतनी कमजोर रहेंगी कि वह सत्ताधारी दल पर हमला करेंगी भी तो वह इतना असरदार नहीं होगा।read more:https://pahaltoday.com/demand-for-financial-assistance-to-the-family-of-the-employment-servant/असल में भाजपा को भी बखूबी पता है कि ममता बनर्जी वापसी करने में सक्षम हैं। अगर टीमसी के सभी विधायक ममता के साथ रहते हैं तो वह मजबूत बनी रहेंगी। लेकिन अगर टीएमसी के कुछ विधायक टूटकर अलग पार्टी बना लेते हैं तो यह ममता को कमजोर बनाएगा। इसलिए भाजपा हमेशा एक टूटी हुई टीएमसी को अपने विपक्षी पार्टी के रूप में देखना चाहेगी, बनिस्बत एकजुट और मजबूत टीएमसी के।टूटी हुई टीएमसी से भाजपा को एक फायदा और होगा। इसके दम पर वह कांग्रेस और लेफ्ट को मजबूत बनने से भी रोक सकेगी। असल में टीएमसी में टूट का फायदा कांग्रेस भी उठाने की फिराक में है। उसे उम्मीद है कि जिन लोगों को कांग्रेस से तोड़कर दीदी ने बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बनाई थी, वह लोग फिर से अपनी मूल पार्टी में लौट आएंगे। लेकिन भाजपा ऐसा नहीं चाहती है। वह चाहती है कि मुख्य विपक्षी दल टीएमसी ही नहीं, भले ही सिम्बोलिक तौर पर ही सही।असल में भाजपा की रणनीति टीएमसी को अंदर से तोड़ने की है। इस तरह ममता बनर्जी के खिलाफ बोलते टीमएसी नेता, अभिषेक बनर्जी का कम होता कद। ममता बनर्जी का अंदरखाने बढ़ता विरोध, भाजपा के लिए हर तरह से फायदेमंद है। भाजपा को पता है कि हार के बाद ममता तात्कालिक तौर पर भले कमजोर पड़ी हों, लेकिन वह खत्म नहीं हुई हैं। लेकिन अगर वह पार्टी पर अपना दबदबा खो देती हैं तो उनका सियासी रसूख भी दांव पर लग जाएगा।यही नहीं सिर्फ बंगाल ही नहीं, कमजोर होने के बाद ममता की पूछ इंडिया गठबंधन में भी कम हो जाएगी। अब यह बात तो जग-जाहिर है कि ममता बनर्जी हमेशा से दिल्ली में बड़ी भूमिका की आकांक्षी रही हैं। लेकिन बंगाल चुनाव में जो हाल हुआ है, उसने ममता के इस इरादे पर भी पानी फेरा है। भाजपा भी यही चाहेगी कि ममता बंगाल तक ही सीमित रह जाएं। वह टूटती टीएमसी को संभालने में इस कदर खो जाएं कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की उनकी मंशा धरी की धरी रह जाए। अब देखना यह है कि भाजपा की यह चाहत पूरी होती है या ममता फिर से कमबैक करने में कामयाब हो पाती हैं।