साइबर गुलाम बनाने वाले नेटवर्क के 1600 सूत्रधार बिहार में थे

स्नेहा सिंह 
विदेश जाकर अधिक पैसा कमाने का सपना लगभग हर युवा देखता है। भारत में बेरोजगारी बढ़ी है। विदेश जाकर डालर कमाकर अपने परिवार को समृद्ध बनाने का अवसर अधिकांश युवा तलाशते हैं। लेकिन आजकल युवाओं की महत्वाकांक्षा का भी व्यापार किया जा रहा है। विदेश जाने और वहां सफल होने की चाह में ये युवा कब साइबर स्लेव (साइबर गुलाम) बन जाते हैं, इसका उन्हें पता भी नहीं चलता। युवाओं को साइबर गुलाम बनाने वाला एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय है। युवा अनेक सपने लेकर विदेश की धरती पर पहुंचते हैं और नौकरी खोजने के लिए विभिन्न एजेंटों के संपर्क में आते हैं। ये एजेंट उनके साथ खतरनाक खेल खेलते हैं। वे यह दावा करते हैं कि उनकी पहचान वहां के शासकों या प्रभावशाली लोगों से है, इसलिए नौकरी आसानी से मिल जाएगी और इसी बहाने युवाओं को अपने जाल में फंसा लेते हैं।
ये एजेंट अपराधी नेटवर्क से जुड़े होते हैं और प्रत्येक युवक को फंसाने के बदले उन्हें मोटा कमीशन मिलता है। बिहार पुलिस ने कंबोडिया, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम और लाओस में भारतीय युवाओं को साइबर गुलाम बनाने वाले गिरोह से जुड़े 1600 लोगों की जांच शुरू की है। यह गिरोह युवाओं को विदेश में नौकरी और बेहतर भविष्य के बड़े-बड़े सपने दिखाता था। उन्हें आकर्षक वेतन की पेशकश की जाती थी।read more:https://pahaltoday.com/a-public-awareness-campaign-will-be-launched-from-june-5-to-21-to-mark-the-completion-of-12-years-of-the-central-government/कहा जाता था कि विदेश में छह महीने नौकरी करने के बाद कार खरीदी जा सकती है, घर नियमित रूप से पैसे भेजे जा सकेंगे, वेतन लगातार बढ़ता रहेगा, रहने की मुफ्त सुविधा मिलेगी और वीजा प्रक्रिया भी तेजी से पूरी कर दी जाएगी। ऐसे लुभावने वादों के जरिए युवाओं को फंसाया जाता था। वास्तव में बिहार के युवाओं को झूठे सपने दिखाकर विदेश भेजा जाता था और वहां पहुंचने के बाद साइबर अपराधी उनके पासपोर्ट जब्त कर लेते थे तथा उन्हें जबरन ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों में शामिल होने के लिए मजबूर करते थे। इन युवाओं के रहने की व्यवस्था तो मुफ्त होती थी, लेकिन वह किसी जेल से कम नहीं होती थी। उन्हें भोजन दिया जाता था और कुछ पैसे घर भेजने की भी अनुमति होती थी, लेकिन वे वापस नहीं लौट सकते थे, क्योंकि उनके पासपोर्ट छीन लिए जाते थे। वीजा की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी उन्हें नहीं छोड़ा जाता था। वहां से भाग निकलना लगभग असंभव था। अखबारों में प्रकाशित नौकरी के विज्ञापनों में अक्सर लिखा होता था कि कंप्यूटर का ज्ञान रखने वालों को प्राथमिकता दी जाएगी। बिहार के छोटे शहरों में जब युवा कंप्यूटर सीखने जाते थे, तब भी विदेश भेजने का लालच देने वाले लोग उनसे संपर्क कर लेते थे। कोरोना काल और उसके बाद के वर्षों में युवाओं को विदेश भेजने वाले ऐसे गिरोह अत्यधिक सक्रिय हो गए थे। दूसरी ओर भारत में साइबर धोखाधड़ी के मामलों में भी लगातार वृद्धि देखी गई। युवाओं को मालवेयर भेजना, फोन पर धमकी देना, कंप्यूटर सिस्टम हैक करना और अन्य साइबर अपराध करना सिखाया जाता था। जो युवा विदेश में बसने के सपने देखते थे, उन्हें अपराधी गतिविधियों में धकेल दिया जाता था। भारत सरकार ने कंबोडिया के अधिकारियों के साथ मिलकर साइबर गुलामी में फंसे 7000 लोगों को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराया। उनसे साइबर धोखाधड़ी से जुड़े काम करवाए जाते थे। यदि कोई काम करने से इनकार करता था तो उसे खाना देना बंद कर दिया जाता था और उसकी पिटाई की जाती थी।
कंबोडिया स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास तक शिकायत पहुंचने के बाद इस नेटवर्क का खुलासा हुआ और कार्रवाई शुरू की गई। जांच में यह भी पता लगाया गया कि ये युवा कंबोडिया तक कैसे पहुंचे और कौन-कौन से एजेंट इस नेटवर्क में शामिल थे। इस पूरे नेटवर्क से जुड़े बिहार के 1600 लोगों की पहचान की गई और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई।

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