सोने के बहाने डॉलर की अकड़ कम करना हो सकता है पीएम का दांव

नई दिल्ली । चौक- राहों से लेकर सोशल मीडिया तक, इन दिनों हर तरफ एक ही सवाल गूंज रहा है कि आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से सोना खरीदने और विदेश घूमने से मना क्यों किया? दरअसल, मौजूदा समय में पश्चिम-एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 75 डॉलर से उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 85प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात करता है और इसका भुगतान डॉलर में करना पड़ता है, इसलिए तेल खरीदना अब देश के लिए बहुत महंगा सौदा साबित हो रहा है। प्रधानमंत्री जानते हैं कि तेल अनिवार्य है क्योंकि ट्रक चलेंगे तभी अनाज पहुंचेगा और फैक्ट्रियां चलेंगी तभी अर्थव्यवस्था की पहिया घूमेगा। इसलिए उन्होंने उन चीजों पर कटौती की अपील की है जिन्हें टाला जा सकता है, जैसे सोना और पर्यटन। प्रधानमंत्री ने लगातार दो दिनों तक जनता से अगले एक साल के लिए सोने से दूरी बनाने, पेट्रोल-डीजल और खाद्य तेल की खपत कम करने के साथ-साथ विदेश यात्राओं को फिलहाल टालने का आग्रह किया है। प्रधानमंत्री के इस बयान के अब गहरे आर्थिक और रणनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। असल में, यह पूरी कवायद भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की गिरती कीमत को संभालने की एक बड़ी कोशिश है। भारत में सोने का मोह जगजाहिर है।read more:https://pahaltoday.com/bjp-mahila-morchas-protest-is-becoming-a-joke/आंकड़ों के अनुसार, वित्त-वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने करीब 6,11,830 करोड़ रुपये का 721 टन से अधिक सोना आयात किया। औसतन भारत हर घंटे 82 किलो सोना विदेशों से खरीदता है। जब हम इतनी भारी मात्रा में सोना या अन्य विलासिता की चीजें खरीदते हैं, तो बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। वर्तमान में रुपया डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर को पार कर चुका है। यदि यह गिरावट जारी रही, तो डॉलर 100 रुपये तक पहुंच सकता है, जिससे देश में भीषण महंगाई का खतरा पैदा हो जाएगा। प्रधानमंत्री की यह अपील करेंट अकाउंट डेफिसिट को काबू में रखने और डॉलर पर भारत की निर्भरता कम करने के लिए है। वर्क-फ्रॉम-होम और कारपूलिंग जैसी सलाहों के पीछे का मकसद भी यही है कि इंटरनेट का उपयोग कर पेट्रोल-डीजल की खपत घटाई जाए, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हो सके। सरल शब्दों में कहें, तो सरकार चाहती है कि वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव का असर मध्यम वर्ग की थाली पर न पड़े और भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के बावजूद आत्मनिर्भर और मजबूत बनी रहे।

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