अखिलेश आर्येन्दु भारतीय समाज को विकसित, शिक्षित और जागरूक बनाने का डॉ. अम्बेडकर का स्वप्न एनडीए सरकार पूरा करते दिखाई दे रही है। बावजूद आज भी देश के करोड़ों लोग शिक्षा व अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पाए हैं। यही वजह है बधुआ मजदूरी, बाल विवाह, गैरबराबरी और गरीबी को किस्मत का खेल या ईश्वराज्ञा मानकर स्वीकार करने वाले और शोषितों की तादाद करोड़ों में है। जुल्म और शोषण का दायरा घटने के बजाय बढ़ा है। एक कुशल अर्थशास्त्री और एक मिशनरी के रूप में उनके योगदान को याद करते हुए यदि भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय को जन आंदोलन बनाने की ओर आगे बढ़े होते तो कोई वजह नहीं कि समाज का गरीब, पिछड़ा और मजलूम तबके की हालात में वर्षों पहले सुधार न हो गया होता। उन्होंने भारतीय शिक्षा के साथ-साथ विदेशों में भी उच्च शिक्षा हासिल किया था। जिससे उन्हें भारतीय और विदेशी देानों तरह के वैज्ञानिक, कानूना और सामाजिक ज्ञान हुआ। कोलम्बिया विश्वविद्यालय में रिसर्च के दौरान डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने एक थिसिस लिखी- नेशनल डिवोटेड आफ इंडिया जो 1924 में प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने फाइनेंस कमीशन का कन्सेप्ट दिया और उसी कन्सेप्ट के आधार पर फाइनेंस कमीशन की स्थापना हुई। यहां पर इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि आज फाइनेंस के उनके विकासवादी कन्सेप्ट की कोई चर्चा नहीं करता और न ही फाइनेंस के मामले में उनके कार्यों पर कोई आगे की रणनीति बनाई जाती है। वे भी नहीं करते जो राजनीतिक दल खुद को अम्बेडकरवादी कहते हैं। गौरतलब है उनके जन्मदिन पर हम उन्हें याद कर उनके कृतित्व और व्यक्तित्व की तारीफ में तमाम कसीदे गढ़ते हैं लेकिन उनके सामाजिक न्याय, धर्म संबंधी विचार, राष्ट्रीय सुरक्षा और शिक्षा संबंधी तमाम विचारों को जन आंदोलन बनाने से कतराते हैं। यही वजह है कि आज भी समाज में जातिवाद, जातिप्रथा, गंदी प्रथाएं, पाखंड, अंधविश्वास, कुरीतियां, भ्रष्टाचार, यौन अपराध, साम्प्रदायिकता और देश को अस्थिर करने वाली ताकतें वक्त-दर-वक्त सिर उठाती रहती हैं। read more:https://pahaltoday.com/dr-satyawan-saurabh-life-is-bigger-than-one-exam-questioning-the-mindset-surrounding-the-upsc/ डॉ. अम्बेडकर ने मजदूरों के हितों की रक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए विधिमंत्री के रूप में संविधान में व्यवस्था की और उनके लिए जीवन-पर्यन्त लड़ाई लड़ते रहे। मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी, मजदूरों के भविष्यनिधि की व्यवस्था बाबा साहब ने अपने कार्यकाल में कर दिया था, लेकिन बाबा साहब के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए एनडीए सरकार ने दो सप्ताह पहले न्यूनतम मजदूरी सहित कई सुधारों के जरिए मजदूरों को शोषण से बचाने और उनकी खुशहाली के लिए जो नए प्राविधान कानून में किया है उससे उनके हालात में सुधार आएगा और काफी हद तक वे शोषण से छुटकारा पा जाएंगे। बाबा साहब चाहते थे कि संविधान के तहत एक आर्थिक ढांचे का निर्माण हो। एक गरीब और असहाय व्यक्ति और परिवार के जीवन में किस-किस तरह की समस्याएं आती हैं और उनसे कदम-कदम पर गरीब को किस तरह दो चार होना पड़ता है, उनका भोगा हुआ यथार्थ था। लेकिन उन्होंने संविधान में बदले की भावना से ऐसा कोई प्राविधान नहीं किया जिससे किसी कौम का अहित होता हो। उन्होंने न जाने कितने तिरस्कार, अपमान और उपेक्षाएं झेलीं थीं लेकिन उन्होंने बदले की भावना से कभी कोई कार्य नहीं किया। उच्च जातियों से उन्होंने कभी बदले की भावना से व्यवहार नहीं किया।read more:https://pahaltoday.com/administration-cracks-down-on-illegal-plotting-in-regulated-areas-city-magistrate-inspects/ यही वजह है कि उनके विचारों से प्रभावित होकर एक उच्च जाति की महिला ने उनसे विवाह किया था। गौर तलब है एक युग निर्माता की तरह उन्होंने ‘सब का साथ-सब का विकास और सब का विश्वास का फार्मूला अपनाया। उन्होंने उन विचारों को आगे बढ़ाया जो भारतीय जनता के लिए हितकारी थे। उन्होंने भारतीय जनमानस को शिक्षित होने, संघर्ष करने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि निर्भय होकर अपने अधिकारों को हासिल करने और देश-समाज के प्रति कर्तव्य को पूरा करने के लिए आगे आने का आह्वान भी किया किया। इतिहास के उन पन्नों को पलटते हैं तो मालूम होता है कि विधिमंत्री रहते हुए उन पर दबाव देकर कुछ ऐसे प्राविधान भी संविधान में कराए गए जो देशहित में नहीं थे उनमें धारा 370 भी एक है। अनुच्छेद 370 जो कभी राजनीति के गलियारे में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय दुनिया में एक चर्चा का विषय माना जाता था को डॉ. अम्बेडकर ने नेहरू के दबाव में दबे मन से अस्थाई रूप में संविधान में जगह दी थी। गौरतलब है संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़ने और कश्मीर को ‘विशेष’ दर्जा देने की मांग शेख अब्दुल ने जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के सामने रखा तो नेहरू ने प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर के पास उन्हें भेजा दिया था। डॉ. अम्बेडकर ने कश्मीर को ‘विशेष’ दर्जा दिलाने के लिए कोई अनुच्छेद जोड़ने से मना कर दिया, परन्तु नेहरू की जिद की वजह से बहुमत के आधार पर यह (अनुच्छेद 370) लागू किया गया। गौरतलब है डॉ. अम्बेडकर ने इस अनुच्छेद को अस्थायी माना। अब जब कि भाजपा सरकार ने श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस धारा को हमेशा के लिए खत्म कर दिया, डॉ. अम्बेडकर के विचारों को ही मूर्तरूप दिया है। अम्बेडकर ने यूं तो अनेक क्षेत्रों में ऐतिहासिक कार्य किए लेकिन उन्होंने सबसे बड़ा कार्य संविधान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर और समाज सुधार के रूप में अपना सर्वोच्च योगदान देकर निभाई। उन्होंने धर्म के बारे में अपना विचार देते हुए कहा था-‘‘कुछ लोगों का सोचना है कि धर्म समाज के लिए जरूरी नहीं है, मैं इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता। मैं धर्म की आधारशिला को जीवन और समाज के व्यवहारों के लिए आवश्यक मानता हूं। साथ में यह भी कहा, ‘‘अगर धर्म (पंथ) को ही मनुष्य के लिए सब कुछ मान लिया जाएगा तो किन्हीं और मानकों का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा।़’’ उन्होंने जीवन को लम्बा बिताने के बजाए, महानता अर्जित करने वाला होने के लिए बनाना चाहिए पर खास जोर दिया।read more:https://pahaltoday.com/questions-raised-over-the-disposal-of-igrs-complaints-youth-accuses-officials/ डॉ.. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘ज्ञान का विकास ही मनुष्य का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को हर हाल में शिक्षित होना आवश्यक है। वे महिलाओं के सम्मान के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने कहा,‘‘किसी भी कौम का विकास उस कौम की महिलाओं के विकास से मापा जाता है। इसलिए प्रत्येक परिवार की प्रत्येक महिला को शिक्षित होना आवश्यक है। उन्होंने व्यक्तिगत गुलामी को मानव की सबसे बड़ी दीनता बताया। उन्होंने कहा,‘‘जिस प्रकार, हर व्यक्ति यह सिद्धांत दुहराता है कि एक देश दूसरे देश पर शासन नहीं कर सकता, उसी प्रकार उसे यह मानना होगा कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन नहीं कर सकता है।’’ उनके ये विचार संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में दर्ज हैं लेकिन उन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। वह चाहे महिला सुरक्षा के बारे में हो या शोषण, जुल्म और किसी की गुलामी के बारे में। बाबा साहब ने सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक रूप से समाज के दबे-कुचले लोगों को विकास की धारा में लाने के लिए क्रांति की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना था, क्रांति की सफलता के लिए गुस्सा/जोश ही पर्याय नहीं है बल्कि न्याय, राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों के प्रति पूरी तरह से जागरूक भी होना पड़ेगा। वह महानता जन्म से नहीं बल्कि अर्जित करके पाने के हिमायती थे। वह ऐसी संस्कृति के पोषक थे जो सबको आगे बढने के समान अवसर की बात करती हो। वह ऐसी व्यवस्था चाहते थे, जहाँ पर धनवान, निर्धन, अपंग और उपेक्षित सभी को बराबर आगे बढ़ाने का समान अवसर और सुविधा हो। वह कहा करते थे-एक महान् व्यक्ति एक प्रख्यात व्यक्ति से एक बिंदु पर भिन्न है कि, महान् व्यक्ति समाज का सेवक बनने के लिए तत्पर रहता है। आज जब कि समानता, सहिष्णुता, प्यार, एकता और इंसानियत की बातें खूब की जाती हैं, लेकिन न तो आजादी के 78 सालों में देश और समाज में किसी भी स्तर और दिशा में समानता दिखाई देती है, न तो सहिष्णुता, प्यार और एकताका ही कोई धारा ही आगे बढ़ती दिखाई पड़ती है। जिस लोकतंत्र व्यवस्था की आधार संविधान संभा के वे अध्यक्ष थे, उस संविधान को लेकर राजनीति करना, क्या लोकतंत्र को मजबूत करने का कार्य हैं या लोकतंत्र को कमजोर करने का? क्या लोकतंत्र के नाम पर ‘स्वच्छन्दता’ को नागरिक आजादी बताना लोकतंत्र को कमजोर करने का कार्य माना जाएगा या लोकतंत्र को मजबूत करने का? ऐसे तमाम सवाल हैं जो आजादी के बहत्तर साल के बाद भी हमारे सामने खड़े हो गए हैं। क्या डाॅ. अम्बेडकर के विचारों और कार्यों से आज के राजनेता, राजनीतिक दल, मंत्री, विधायक व सांसद कुछ सीखने की कोशिश करेंगे या महज उनकी मूर्ति पर फूल-माला चढ़ाकर झूठी श्रद्धांजलि देकर आगे बढ़ जाएंगे? उन जीवन, समाज, देश और मानवीय मूल्यों की सुरक्षा और संरक्षण के कार्य कौन आगे बढ़ाएगा जिसे डॉ. अम्बेडकर एक विकसित समाज, देश, संस्कृति और प्रगति के लिए जरूरी मानते थे?