लखनऊ: भारतीय मनीषा ने प्रकृति में भव्यता का प्रत्यक्ष अनुभव किया। उसे भव्य मानते हुए प्रणाम किया। चरक संहिता में कहा गया यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ अर्थात जो इस ब्रह्माण्ड में है वही सब हमारे शरीर में भी है। भौतिक संसार पंचमहाभूतों से बना है-आकाश, वायु, अग्नि,जल और पृथ्वी। उसी प्रकार हमारा हमारा यह शरीर भी इन्हीं पाँचों महाभूतों से बना हुआ है। इस प्रकार ब्रह्माण्ड और शरीर में समानता है। स्थूल व सूक्ष्म की दृष्टि से ही अंतर है। सनातन धर्म में शक्ति आराधना का विधान है। देश में इक्यावन शक्तिपीठ है। संपूर्ण वातावरण ही भक्तिमय है। कोलकाता कीकालीघाट शक्तिपीठ भी इनमें सम्मिलित है। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान आत्मिक रूप से सशक्त बनाता है। नकारात्मक ऊर्जा का निराकरण होता है। सकारात्मक भाव व सद्गुणों का विकास होता है। इस मंदिर में देवी काली विराजमान हैं। देवी काली भगवान शिव की छाती पर चरण रखे हैं। उनके गले में नरमुंडो की माला है। जिह्वा स्वर्ण निर्मित है।read more:https://pahaltoday.com/sampoorna-samadhan-diwas-was-organized-under-the-chairmanship-of-dm/ मान्यता है कि देवी ने अत्यंत क्रुद्ध होकर नरसंहार प्रारंभ किया था। उनके क्रोध को शान्त करने के लिए भगवान शिव उनके मार्ग में लेट गए। देवी के चरण उनकी छाती पर पड़ गए। उन्होंने देखा कि यह तो साक्षात भोलेनाथ है। मां काली का क्रोध तत्क्षण शांत हो गया। पौराणिक कथाओं के अनुसार सती के शरीर के अंग प्रत्यंग जहाँ भी गिरे वहाँ शक्तिपीठ बन गये। ब्रह्म रंध्र गिरने से हिंगलाज, शीश गिरने से शाकम्भरी देवी, विंध्यवासिनी, पूर्णगिरि, ज्वालामुखी, महाकाली आदि शक्तिपीठ बन गये। माँ सती के दायें पैर की कुछ अंगुलिया इसी जगह गिरी थीं। कोलकाता में ही दक्षिणेश्वर काली मंदिर है। यहां की मुख्य देवी भवतारिणी है। प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम के करीब तीन वर्ष पहले रानी रासमणि ने इसका निर्माण कराया था। यह स्वामी रामकृष्ण परमहंस की साधना स्थली भी है। वह इस मंदिर के प्रधान पुरोहित भी रहे। दक्षिणेश्वर माँ काली मंदिर के सामने नट मंदिर स्थित है। यहां राधाकृष्ण का दालान और बारह शिव मंदिर है। चाँदनी स्नान घाट के चारों तरफ शिव के मंदिर हैं।