मोहसिना किदवई का निधन: एक युग का हुआ पटाक्षेप

बाराबंकी। कांग्रेस पाटÊ का एक बड़ा नाम रहीं मोहसिना किदवई का 94 वर्ष की आयु में दिल्ली में निधन हो गया। उनके भांजे और जिले के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता फवाद किदवई ने बताया कि बुधवार को दिल्ली में निजामुद्दीन स्थित कब्रिस्तान में शाम करीब 05 बजे सुपुर्द-ए-खाक किया गया। वह अपने पीछे दो बेटियों सहित भरापूरा परिवार छोड़ गई। मोहसिना किदवई भले ही दिल्ली में रहने लगी थीं लेकिन, उनका बाराबंकी से गहरा लगाव था। जब भी वह बाराबंकी आती थीं लोग उन्हें हाथों हाथ लेते थे। मोहसिना किदवई शायद पहली महिला नेत्री थीं, जिन्होंने चारों सदन का नेतृत्व किया। वरिष्ठ पत्रकार हशमत उल्लाह बताते हैं कि बाराबंकी जिले के जैदपुर थाना क्षेत्र के अहमदपुर में 1 जनवरी 1932 को मोहसिना किदवई का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम कुतुबुद्दीन अहमद उर्फ मुल्ला मियां था। प्रारम्भिक शिक्षा लेने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वीमेंस कॉलेज से उन्होंने इंटरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त की। दिसम्बर 1953 में उनकी शादी मसौली थाना क्षेत्र के बड़ागांव कस्बे के मशहूर फ्रीडम फाइटर और एमएलए रहे जमील उर रहमान किदवई के बेटे खलील उर रहमान किदवई से हुई थी। उनके तीन बेटियां हैं।read more:https://pahaltoday.com/sdm-arrived-to-investigate-the-complaint-of-diesel-storage/ वह बताते हैं कि पति की दिलचस्पी खेलों की तरफ थी, वह स्पोर्ट ऑफिसर थे। जबकि ससुर जमीलउर्रहमान किदवई खांटी राजनेता। उन्हीं की प्रेरणा से मोहसिना किदवई की दिलचस्पी राजनीति में बढ़ी। इनके ससुर जमीलउर्रहमान की पंडित नेहरू से दोस्ती थी। मोहसिना किदवई की सोशल कार्यों में दिलचस्पी देख पंडित नेहरू ने उन्हें मिलने के लिए दिल्ली बुलाया। जमीलउर्रहमान किदवई के साथ मोहसिना दिल्ली गईं जहां उनकी मुलाकात पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी से हुई। वह बताते हैं कि शादी के कुछ दिनों बाद शुरुआत में मोहसिना किदवई ने महिलाओं को जोड़ा और उन्हें स्वावलम्बी बनाने के लिए सिलाई कढ़ाई जैसे प्रशिक्षण दिलाये। अशिक्षित महिलाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक करना शुरू किया. इसके बाद मोहसिना किदवई की पहचान जिले में एक सोशल वर्कर के रूप में होने लगी। साथ ही जिले की कांग्रेस राजनीति में उनका कद बढ़ने लगा। वह बताते हैं कि साल 1960 का यह वह दौर था जब एमएलसी जमीलउर्रहमान बीमार पड़ गए, तब कांग्रेस हाई कमान के निर्देश पर मोहसिना किदवई को टिकट दिया गया और वे पहली बार एमएलसी बनीं। साल 1966 तक वे एमएलसी रहीं। इसके बाद जब वह दोबारा चुनावी मैदान में आईं तो 250 वोटों से हार गईं। अब तक उनकी पहचान एक तेज तर्रार महिला नेत्री के रूप में राजधानी लखनऊ तक गूंजने लगी थी। लिहाजा उस वक्त के मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्ता ने राज्यपाल से सिफारिश कर मोहसिना किदवई को साल 1966 में एमएलसी नामित करा दिया।read more:https://pahaltoday.com/mla-sakendra-verma-met-cm-yogi/  वह साल 1960 से 1974 तक एमएलसी रहीं। वह बताते हैं कि साल 1972 में जब हेमवती नंदन बहुगुणा प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उनकी सरकार में मोहसिना राज्यमंत्री बनीं. साल 1974 में जब सूबे के आम चुनाव हुए तो मोहसिना क़िदवई ने मसौली से चुनाव लड़ा और पहली बार विधानसभा पहुंचीं। साल 1974 में पहली बार वह सूबे की सरकार में कैबिनेट मंत्री बनीं। इमरजेंसी के वक्त मोहसिना किदवई प्रदेश की कांग्रेस अध्यक्ष रहीं। साल 1977 में हुए चुनाव में उन्होंने मसौली से फिर चुनाव लड़ा लेकिन, वह हार गईं। साल 77-78 में जब रामनरेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो आज़मगढ़ सीट खाली हो गई। साल 1978 में आज़मगढ़ लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मोहसिना किदवई को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया। आजमगढ़ से चुनाव जीतकर पहली बार मोहसिना किदवई लोकसभा पहुंचीं. साल 1982 में इंदिरा गांधी ने उन्हें अपनी सरकार में राज्यमंत्री बनाया. साल 1984 में राजीव गांधी सरकार में मोहसिना को शहरी विकास मंत्री बनाया गया। वह मेरठ से साल 1980 और फिर 1984 में दो बार सांसद रहीं। वह बताते हैं कि कांग्रेस पाटÊ ने मोहसिना किदवई को छतीसगढ़ से साल 2004 में राज्यसभा भेजा और वे 2016 तक राज्यसभा सांसद रहीं. वह बताते हैं कि भले ही मोहसिना किदवई की राजनीति में व्यस्तता रही हो लेकिन, वह बाराबंकी को कभी नही भूलीं. जिले में महिलाओं की शिक्षा पर उनका मुख्य फोकस रहा। लिहाजा उन्होंने महिला शिक्षा को लेकर एक स्कूल की स्थापना की जो आज बाराबंकी शहर में सिविल लाइन में स्थित जमीलउर्रहमान गल्र्स इंटर काॅलेज के नाम से मशहूर है। मोहसिना किदवई के प्रयासों से नगर में सूत मिल की भी स्थापना हुई, हालांकि किन्हीं कारणों से आज वह बन्द है। वह बताते हैं कि मोहसिना किदवई शायद एक अकेली महिला नेत्री थीं जिन्होंने देश के चारों हाउसेस का प्रतिनिधित्व किया है। वह विधान परिषद की सदस्य रहीं, विधानसभा की सदस्य रहीं, राज्यसभा की सदस्य रहीं और लोकसभा की सदस्य रहीं। मोहसिना क़िदवई अपने जीवन पर्यंत महिलाओं और बच्चों के उत्थान और समाज के पिछड़े वर्गों के सुधार के लिए प्रयासरत रहीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी मौत से बाराबंकी की राजनीति में एक बड़ी कमी आ गई है।

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