प्रधानमंत्री को मिल जुल कर समस्या का समाधान करना चाहिए

ओंकार नाथ सिंह

अभी हाल ही में दिनांक 1 अप्रैल को राज्यसभा में विपक्ष के नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री के बीच तीखी नोक झोंक देखने को मिली। अमेरिका इजरायल और ईरान के युद्ध कारण पश्चिम एशिया के अरब देशों में जो स्थित बनी हुई है उस पर राज्य सभा में विपक्ष चर्चा चाहता था । इस युद्ध के कारण देश को ईधन की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। लोगों को एल पी जी गैस सुचारू रूप से नहीं मिल रही है । सभी शहरों में लोग गैस सिलेंडर लेकर गैस विक्रेता के कार्यालय के सामने लंबी कतारों में खड़े मिल रहे हैं। कमर्शियल सिलेंडर तो मिल ही नहीं रहे है और यदि मिल भी रहे हैं तो ब्लैक में काफ़ी महंगे मिल रहे हैं जिस कारण बहुत से रेस्टोरेंट तो बंद ही हो गए हैं। पेट्रोल पंप के सामने भी डीज़ल और पेट्रोल की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं ।इसलिए विपक्ष इस पर सदन में चर्चा चाहता था।नेता विरोधी दल खड़गे जी ने कहा कि उन्होंने इस गंभीर विषय पर चर्चा करने के लिए सरकार को दो पत्र लिखे लेकिन उनके पास इस गंभीर विषय पर चर्चा के लिए समय ही नहीं है। कीमते लगातार बढ़ती जा रही हैं और जो भी सुझाव विपक्ष देता है उसे वह रिजेक्ट कर देते हैं और जो भी चाहते हैं उसे ज़बरदस्ती बहुमत के आधार पर पास करा देते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/free-medical-camp-for-cleft-lip-and-palate-patients-in-kaiserganj/ उन्होंने कहा कि क्या यही लोकतंत्र है कि सत्ता अपनी मनमानी करे। इसका जवाब देते हुए संसदीय कार्यमंत्री रिजजू ने कहा कि सरकार पश्चिमी एशिया के मुद्दे पर चर्चा करने से भाग नहीं रही है । संबंधित मंत्री और प्रधानमंत्री ने दोनों सदनों में बयान दिए और वस्तु स्थित से अवगत कराया। इस संबंध में आल पार्टी मीटिंग भी हुई थी परंतु दोनों सदनों के नेता विरोधी दल मीटिंग में उपस्थित नहीं हुए। इसी बात पर खड़गे जी ने कहा कि आल पार्टी मीटिंग में प्रधानमंत्री जी भी नहीं आए थे । जैसे मंत्री उस मीटिंग में थे तो विपक्ष की तरफ़ से भी हमारे प्रतिनिधि थे।यह बात सच है कि गंभीर विषयों पर जब भी आल पार्टी मीटिंग होती है तो अधिकतर उस मीटिंग में प्रधानमंत्री उपस्थित नहीं रहते हैं। इसके पहले जब पहलगाम में सामूहिक हत्याएं पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा की गई थीं तो उस समय सम्पूर्ण विपक्ष ने भारत सरकार को पूर्ण सहयोग दिया कि इस कार्यवाही का जवाब दिया जाना चाहिए। और उस समय जब आल पार्टी मीटिंग हुई तो उस मीटिंग में दोनों सदनों के नेता विरोधी दल के अलावा सम्पूर्ण विपक्ष उपस्थित हुआ परंतु प्रधानमंत्री स्वयं नहीं उपस्थित हुए। परंतु स्थित की गंभीरता देखते हुए सम्पूर्ण विपक्ष ने सरकार को खुली छूट दी कि इसका बदला लेने के लिए सरकार स्वतंत्र है।read more:https://khabarentertainment.in/free-medical-camp-for-cleft-lip-and-palate-patients-in-kaiserganj/ उसके बाद क्या हुआ और क्या नहीं यह बताने की आवश्यकता नहीं है क्यूंकि सभी लोग इसे जानते हैं। यहाँ चर्चा स्वस्थ लोकतंत्र की हो रही है। एक समय था जब सत्ता पक्ष के सदस्य ही लोकसभा और राज्यसभा में दिखते थे और विपक्षी सदस्यों की संख्या सीमित रहती थी लेकिन उस समय जब भी आल पार्टी मीटिंग होती थी तो उस मीटिंग में प्रधानमंत्री अवश्य रहते थे तथा विपक्ष के सदस्यों की बात को महत्व देते थे। उस वक्त के प्रधानमंत्री इसे समझते थे कि कोई गंभीर और महत्वपूर्ण सुझाव उनके द्वारा भी आ सकता है क्यूंकि देश का हित तो सभी भारतीय चाहते हैं। आपको याद होगा जब जिनेवा सम्मेलन में भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के विरुद्ध अपना पक्ष रखना था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भारत का पक्ष रखने के लिए तत्कालीन भाजपा नेता अटल बिहारी बाजपेयी को सरकारी डेलीगेशन में तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद के साथ नेतृत्व करने के लिए भेजा था। जब वह वहां पहुंचे तो लोगों को आश्चर्य हुआ कि भारत में सत्ता पक्ष से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाली पार्टी सरकार की हिमायत करेगी। शायद वह नहीं समझ पाये कि उस समय की सरकार और विपक्ष में विचारों का मतभेद तो था परंतु मनभेद नहीं था क्यूंकि देश तो दोनों का ही है और दोनों है उसे अपने अपने विचारों से उसकी प्रोन्नति चाहते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/a-review-meeting-of-land-acquisition-works-was-held-under-the-chairmanship-of-dm/ यह तो सच है कि देश में ईधन की समस्या बहुत गंभीर है। इस देश में अवैध गैस कनेक्शन भी बहुत हैं क्युकी जो लेबर , टैक्सी ड्राइवर , छोटी नौकरियों में लोग दूसरे शहरों में अपनी जीविका चलाने जाते हैं उसमे अवैध कनेक्शन वाले बहुत होते हैं क्युकी उनका वैध कनेक्शन तो वहाँ लगा होता है जहाँ उनका परिवार स्थायी रूप से होता है।इसीलिए इसके चलते कालाबाजारी भी होती है और गैस की दुकानों के आगे लंबी कतारें भी देखने की मिलती हैं। अगर कमर्शियल गैस की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो रेस्टोरेंट तो बंद होंगे ही बेरोज़गारी की भी समस्या बढ़ेगी। पहले लोग लकड़ी और कोयले पर खाना बना लेते थे लेकिन अब बड़े बड़े टावरों में लोग फ्लैट में रहते हैं उनके सामने सबसे बड़ी समस्या तो लकड़ी और कोयला रखने की होगी यदि वह इस साधन से भोजन बनाने की सोचते हैं।सरकार को यह सोचना चाहिए कि उसने देश के नागरिकों को ऐसी सुविधाएं तो मुहैया करा दी हैं जिसका उत्पादन हमारे देश में होता ही नहीं है। हमे सदैव ऐसे देशों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा जो इसका उत्पादन करते हैं । इसलिए सबसे पहले उनकी तलाश करनी चाहिय कि कैसे हम मुसीबत के समय इनका मुक़ाबला कर सकेंगे। इसके लिए हमे सस्ती बिजली के उत्पादन की नीति तैयार करनी पड़ेगी जिससे गैस के अभाव में भोजन हम बिजली से तैयार कर सकें और गाड़ियों को चलाने के लिए अधिक से अधिक उच्च कोटि के बैटरी वाहनों का निर्माण करें।यह तो आप भी जानते हैं कि देश की सत्ता चलाने का अनुभव कांग्रेस को भाजपा से अधिक रहा है और जब नेहरू , शास्त्री, इंदिरा और राजीव सत्ता में थे तो विपक्ष को सत्ता चलाने का उतना अनुभव नहीं था लेकिन तब की सरकारों ने कभी भी विपक्ष को देश के गंभीर विषयों से अवगत कराने और उनकी सलाह मानने में कोई कोताही नहीं की। जब भी देश जटिलता में होता है तो उसका समाधान सबको मिलजुल कर ही करना चाहिए। सत्ता पक्ष के मंत्री अक्सर सदन में यह कहते हुए सुने जाते हैं कि विपक्ष अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाता है वह देश के साथ खिलवाड़ कर रहा है। वह प्रधानमंत्री का सम्मान नहीं करता। संसदीय कार्यमंत्री अपने को नहीं देखते जो अनेकों बार राहुल गांधी को अपरिपक्व कहते हैं । वही नहीं कई भाजपा नेता तो उन्हें अबोध बालक कहकर पुकारते हैं । इससे वह उनका ही अपमान नहीं करते हैं बल्कि उस संसदीय क्षेत्र की जनता का भी अपमान करते हैं जो उन्हें लगातार चुन कर भेजती है। सरकार को उनके अनुभवों का लाभ लेना चाहिए और मिल जुल कर प्रधानमंत्री को समस्या का समाधान करना चाहिए। पुरानी वाली बार्डर फ़िल्म का एक डायलाग याद आ रहा है
हम ही हम हैं को क्या हम हैं और तुम्ही तुम हो तो क्या तुम हो।

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