बेचारा नोबेल भी क्या करे उसे भी अपनी इज़्ज़त बचानी थी।डोनाल्ड ट्रंप साहब जब दूसरी बार सत्ता के सिंहासन पर विराजे तो उनके मन में एक ही दिव्य प्रकाश की किरण प्रस्फुटित हुई, कुछ ऐसा किया जाय कि इतिहास और दुनिया भी दंग रह जाए और नोबेल पुरस्कार खुद चलकर व्हाइट हाउस के दरवाज़े पर नतमस्तक हो जाए। उन्हें लगा कि दुनिया में शांति स्थापित करना उतना ही आसान है जितना ट्विटर अब एक्स पर एक पोस्ट डालना।उन्होंने ऐलान किया मैंने कइ देशों के बीच शांति स्थापित करा दी है। इंटरनेशनल मीडिया ने पूछा कौन कौन से देश?उन्होंने कहा नाम मत पूछो, शांति गोपनीय होती है नाम उजागर करने से शांति भंग होने की आशंका हो जाती है।अब ट्रंप साहब शांति के होलसेल ठेकेदार बन गए कि जहाँ शांति दिखी, वहाँ उन्हें खतरा महसूस हुआ। बोले ये कैसी शांति है जिसमें मेरा रोल और योगदान नहीं? बस फिर क्या था, उन्होंने शांति को बचाने के लिए युद्ध की चाबी घुमा दी अस्त्र-शस्त्र का बटन ऑन कर दिया।read more:https://worldtrustednews.in/mission-shakti-5-0-phase-ii-police-conducts-awareness-campaign-on-women-safety-empowerment-and-legal-rights-in-marketspublic-places/ ईरान की तरफ़ एक तिरछी नज़र डाली, वेनेजुएला की तरफ़ दूसरी, जैसे कोई डॉक्टर मरीज को बचाने के लिए पहले उसे बीमार घोषित कर देता है, मरीज गंभीर बीमार है इसे इलाज की जरूरत है और इसका इलाज मैं ही कर सकता हूं। उन्हें पूरा यकीन था कि नोबेल कमेटी सोच रही होगी इतना महान आदमी हमने आज तक कैसे नहीं देखा, जो युद्ध करके शांति लाता और पूरी दुनिया में इसका डिंडोरा पिटता है,लेकिन नोबेल कमेटी वाले भी कोई साधु-संत तो हैं नहीं उन्हें पता है कि यह शांति नहीं, “शांति का रियलिटी शो या डुप्लीकेट डेमो चल रहा है, जिसमें हर एपिसोड के बाद टीआरपी गिर जाती है। उधर बराक ओबामा साहब का नाम इतिहास में पहले से दर्ज है। ट्रंप जी को यह बात कुछ वैसी ही चुभती थी जैसे पड़ोसी के घर में खरीदी गई नई कार, उन्होंने सोचा—“अगर ओबामा जी को नोबेल मिल सकता है, तो मुझे क्यों नहीं? मैं तो उनसे ज़्यादा एक्टिव हूँ कम से कम ट्वीट तो ज़्यादा करता हूँ और सोशल मीडिया में उनसे कहीं ज्यादा सुपर एक्टिव हूं।नोबेल पुरस्कार भी कोई चुनावी वादा तो था नहीं कि भाषण देकर ले हथिया लिया जाए। वह चुपचाप बैठा रहा, जैसे किसी जिद्दी बच्चे की जिद सुनकर बाप अनदेखी कर चुचाप अख़बार पढ़ता रहे। आख़िरकार ट्रंप जी समझ गए कि नोबेल पुरस्कार भी एक अजीब नायाब मृग मरीचिका है जिसे पाने के लिए जितना दौड़ो, वो उतना ही दूर भागती है,इधर दुनिया ने यह नया सिद्धांत सीख लिया,जहाँ युद्ध ज़्यादा हो, वहाँ शांति की बात सबसे ज़्यादा होती है।”
ट्रंप साहब को नोबेल तो नही मिला, पर एक नई उपलब्धि सीख की तरह जरूर मिल गई, इतिहास में यह दर्ज हो गया कि शांति के नाम पर सबसे ज़्यादा शोर किसने मचाया,किसने सबसे ज्यादा ढिंढोरा किसने पीटा।
ट्रंप साहब को नोबेल तो नही मिला, पर एक नई उपलब्धि सीख की तरह जरूर मिल गई, इतिहास में यह दर्ज हो गया कि शांति के नाम पर सबसे ज़्यादा शोर किसने मचाया,किसने सबसे ज्यादा ढिंढोरा किसने पीटा।
कविता,
संजीव-नी।
ज़िंदगी में मुफ़्त कहां ख़ुशी मिलती है?
रात की तबाह नींदों से ही मिलती है।
पथरीली राह में जब पाँव लहूलुहान हुए,
बड़ी मुश्किल से तब मंज़िल मिलती है।
शौक़ बेवजह दिलों में यूँ ही पाले कब से
पत्थरों से टकराकर उनकी झलक मिलती है।
कई सफ़्हे यूँ ही स्याही में डुबो कर देखो,
तब कहीं जा के मुकम्मल ग़ज़ल बनती है।
ज़िंदगी को तो बड़े शौक़ से गले लगाया,
मौत से ही उसकी कोई शै मिलती है।
जब भी जलते सफ़र में ये पाँव के छाले,
सख़्त चट्टानों में फिर एक राह मिलती है।
संजीव ये हक़ीक़त समझ लो अब तुम,
दर्द के अश्कों में ही हर निशात मिलती है।
निशात- खुशी।