अनुराग शुक्ला:राजनीति में संकेत बहुत महत्वपूर्ण होते हैं ये तो सब जानते हैं पर राजनीति की अपनी भाषा भी होती है। ये भाषा दल से ऊपर होती है। ये स्वर और सुर दोनों बदल जाते हैं, सदन की सीट बदलते ही।कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और सपा के नवाधीश अखिलेश यादव ने कांशीराम जी की हालिया जयंती पर उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देने की बात की है। इन्हीं भारत रत्न दिलाने का संघर्ष कर रहे दो लड़कों की जोड़ी की सरकारें उत्तर प्रदेश और केंद्र में थीं। उनकी मृत्यु पर एक दिन की छुट्टी तक घोषित नहीं की थी। उत्तर प्रदेश में ना तो तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने ना ही तत्कालीन केंद्र सरकार के पोस्टर ब्वाय राहुल गांधी को उस समय कांशीराम जी की याद आई।कांशीराम जी को भारत रत्न मिले या ना मिले ये विवाद और विमर्श का मुद्दा हो सकता है पर समुदाय के लिए बहुत बड़े थे। सिर्फ दलित समुदाय के लिए एक समाज के लिहाज से बहुत बड़ा। समाज तभी आगे बढ़ता है जब सारे वर्ग आगे बढ़ें।कई बार हर कुछ रुटीन औऱ एक ढर्रे से काम करने को कहा जाता है कि क्या क्लर्क्स की तरह काम करते हो, कापीबुक स्टाइल पर इन्हीं कांशीराम जी ने आम क्लर्कों को समाज परिवर्तन के लिए अपना समय, प्रतिभा और धन देने के लिए प्रेरित किया।डीएस 4 और बामसेफ दोनों संगठन कांशीराम द्वारा वंचित समाज को संगठित करने के लिए बनाए गए थे। डीएस 4 सीधे राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन चलाता था, जबकि बामसेफ शिक्षित कर्मचारियों का नेटवर्क बनाकर बहुजन हित के लिए काम करता था।दलित शोषित संघर्ष समिति यानी डीएस 4 जन आंदोलन की तरह काम करता था। रैलियों, सभाओं और सामाजिक अभियानों के माध्यम से दलितों को जागरूक करता था। जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता था। इसका फोकस था सड़क पर आंदोलन और जनता को संगठित करना।बामसेफ एससी,एसटी, पिछड़े, अल्पसंख्यक शिक्षित कर्मचारियों को जोड़कर सामाजिक न्याय और समानता के लिए काम करने वाला गैर-राजनीतिक था और कर्मचारियों को सामाजिक चेतना से जोड़ता था। यह शिक्षित वर्ग को संगठित कर आंदोलन को बौद्धिक और संस्थागत आधार देने का काम करता था।राहुल गांधी ने लखनऊ में कांशीराम जयंती पर इस साल एक कार्यक्रम किया। कार्यक्रमम सार्वजनिक था। होर्डिंग लगे, बैनर लगे पर मीडिया को सार्वजनिक कार्यक्रम से बाहर कर दिया। इसी कार्यक्रम ने कहा कि कांग्रेस ने गलती की इसीलिए कांशीराम जी को पार्टी बनाने की जरुरत पड़ी। कांशीराम ने दलितों और वंचितों को आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा दी। नेता प्रतिपक्ष राहुल की भाषा में ही बोलें तो कांशीराम ने ये सारे आंदोलन कांग्रेस की गलतियों का नतीजा था। कांशीराम ने दलितों से जुड़े सवाल उठाए और अंबेडकर जयंती के दिन अवकाश घोषित करने की मांग की। अंबेडकर जयंती पर अवकाश को लेकर वो सारी जिंदगी संघर्ष करते रहे पर सार्वजनिक अवकाश घोषित हुआ 2025 में।कांशीराम का मानना था कि पूना पैक्ट के बाद दलित राजनीति को कमजोर किया गया। कांग्रेस जैसी पार्टियाँ दलितों को “चमचा नेताओं” के जरिए नियंत्रित करती हैं, जो जनता के हित में नहीं बल्कि सत्ता के हित में काम करते हैं। 1982 में उन्होंने ‘द चमचा एज’ लिखी जिसमें उन्होंने उन दलित नेताओं की आलोचना की जो कांग्रेस जैसी परंपरागत मुख्यधारा की पार्टी के लिए काम करते है। उन्होंने दलितों को चेताया कि वे “चमचा नेताओं” के जाल में न फँसें और अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनाएं। यह किताब बसपा की वैचारिक नींव रखती है।कांशीराम ने तो राजीव गांधी को संसद पहुंचने से रोकने के लिए 1989 में अमेठी से ललकारा था। परिणाम क्या था इससे महत्वपूर्ण उनका हौसला था। उन्होंने चुनाव के दौरान कहा था “मेरे चुनाव लड़ने से पहले राजीव गांधी अपनी जीत का नतीजा आराम से टीवी पर बैठकर ही सुनता था। मैंने जिस दिन अमेठी में पैर रखा तो राजीव गांधी ने 1 घंटे के लिए भी अमेठी सूनी नहीं छोड़ी। मैंने उसको 4-4 फुट की गलियों में घुमा घुमा कर मार दिया, जिनमें 24 घंटे ही पानी या कीचड़ खड़ा रहता था ।” चुनाव में उनकी जमानत जब्त हुई पर उनका बयान ऐतिहासिक बन गया उन्होंने कहा था “मैंने आपको दिल्ली मुग़ल-ए-आज़म से दिल्ली का रोड मास्टर बना कर रख दिया है।“1985 में कांशीराम ने जब मायावती को बिजनौर लोकसभा उपचुनाव में उतारा तो राजीव गांधी ने आईएफएस अधिकारी मीराकुमार को उनका विरोध करने के लिए उतार दिया। पम्मी लालोमजारा की किताब मैं कांशीराम बोल रहा हूं में लिखा है कि मीरा कुमार के उपचुनाव जीतने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मीरा कुमार के पिता जगजीवन राम को बुला कर अपमान किया और कहा कि अगर आपके पास व्यक्तित्व होता तो कांग्रेस को आपकी बेटी को जिताने के लिए इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती।कांग्रेस और कांशीराम के संबंधों की तरह खटास भरे थे। समाजवादी पार्टी से कांशीराम के रिश्ते खट्टे मीठे रहे। 1991 में वो पहली बार संसद सपा के समर्थन से पहुंचे पर 2 जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव के प्रति कड़ी नाराजगी जाहिर की थी, जिसमें उन्होंने मुलायम सिंह को एक “पंचायत स्तर का नेता” बताया था, जिसे उन्होंने मुख्यमंत्री पद तक पहुँचाया था।सपा औऱ कांग्रेस नेतृत्व की इस पीढ़ी में कांशीराम के प्रति उपजा सम्मान दरअसल सियासत का सीधा समीकरण है। सपा और कांग्रेस दोनों को लग रहा है कि मायावती की यूपी पर सियासी पकड़ कमजोर हो रही है। कांग्रेस दलितों की ओल्ड च्वाइस रही है, वहीं सपा पीडीए की राजनीति के जरिए पिछड़े वोटबैंक का विस्तार दलितों में करने को आतुर हैं। 2024 के चुनाव परिणाम को आधार बनाकर। उनकी सोच है कि अगर मायावती का वोट बिखरा तो उनका सियासी पकड़ मजबूत होगी। वैसे एक दिन सोशल मीडिया पर देखी युवा कवि रामायण धर द्विवेदी की कविता भी याद आ रही है जो इस समय बहुत सामयिक है।
अंधियारे में तीर चलाना छोड़िए,
कठिन लगन से आंख चुराना छोड़िए,
और एक के तीन बनाना छोड़िए
अगर मगर कर समय बिताना छोडिए