रंगीन गधों का मेला  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’-

शहर के ‘विद्वान विला’ अपार्टमेंट में सन्नाटा ऐसा था जैसे किसी पुस्तकालय में मातम छाया हो। यहाँ के स्वघोषित दार्शनिक प्रोफेसर गजानन ‘गंभीर’, अपनी खिड़की के पर्दों के पीछे छिपे बाहर की दुनिया को घृणा से देख रहे थे। होली का दिन था, और प्रोफेसर के अनुसार, यह वह दिन था जब होमो सेपियन्स स्वेच्छा से ‘याहू’ बनने का निर्णय लेते हैं। प्रोफेसर ने अपनी डायरी में लिखा—”आज मानवता सामूहिक रूप से पागलखाने से छुट्टी पर है।” उनके लिए रंग केवल पिगमेंट नहीं, बल्कि तर्कशक्ति पर फेंका गया तेजाब था। वे खिड़की से देख रहे थे कि कैसे उनके पड़ोसी, जो कल तक ‘क्वांटम फिजिक्स’ पर चर्चा करते थे, आज बंदरों की तरह चीखते हुए एक-दूसरे के चेहरे पर कीचड़ मल रहे हैं। प्रोफेसर का मानना था कि सभ्यता की ऊँचाई से गिरने का सबसे छोटा रास्ता ‘गुलाल’ की एक पुड़िया से होकर गुजरता है, जहाँ मनुष्य अपनी पहचान मिटाकर एक बहुआयामी जोकर में तब्दील हो जाता है।तभी प्रोफेसर के परम मित्र और मनोवैज्ञानिक डॉ. विचलित का फोन आया, जो स्वयं को ‘बुद्धि का आखिरी किला’ समझते थे। डॉ. विचलित की आवाज़ में कंपकंपी थी, “गजानन, क्या तुमने देखा? वर्मा जी ने अपनी ऑडी पर तिरपाल नहीं ढका है! वे इस रंगीन बर्बरता का स्वागत कर रहे हैं। यह मानसिक दीवालियेपन की पराकाष्ठा है।read more:https://pahaltoday.com/crude-oil-prices-are-out-of-control-due-to-the-war-what-is-the-real-reason-behind-the-war-and-when-will-it-end/ ” प्रोफेसर ने ठंडी आह भरते हुए उत्तर दिया, “डॉक्टर, वर्मा जी तो कब के इस संक्रामक मूर्खता के शिकार हो चुके हैं। कल वे मुझसे कह रहे थे कि होली ‘हृदय के मिलन’ का पर्व है। मैंने उनसे पूछा कि क्या हृदय मिलने के लिए चेहरे का बैंगनी होना अनिवार्य है? जिस समाज में प्रेम व्यक्त करने के लिए रसायन और कीचड़ की आवश्यकता पड़े, समझ लीजिए कि वहाँ विवेक की मृत्यु हो चुकी है।” दोनों मित्रों ने शपथ ली कि वे आज के दिन ‘बौद्धिक उपवास’ रखेंगे और किसी भी ‘रंगीन आतंकवादी’ को अपने द्वार के भीतर कदम नहीं रखने देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें शांति का मार्ग ही क्यों न चुनना पड़े।दोपहर होते-होते ‘विद्वान विला’ के बाहर का दृश्य किसी युद्धभूमि जैसा हो गया था, जहाँ हथियार के रूप में पिचकारियाँ और गोला-बारूद के रूप में पानी के गुब्बारे इस्तेमाल हो रहे थे। हुड़दंगियों की एक टोली ‘जोगीरा सारा रारा’ का गान करते हुए निकली, जिसका साहित्य सुनकर प्रोफेसर गजानन को लगा कि उनकी सारी डिग्रियाँ नाली में बह गई हैं। उन टोलियों में ऊँचे पदों पर बैठे अधिकारी भी थे, जो अपनी मर्यादा को भांग के गिलास में घोलकर पी चुके थे। प्रोफेसर ने टिप्पणी की, “देखिए डॉक्टर, यह भांग की महिमा है। यह वह अद्भुत तरल है जो एक गधे को दार्शनिक और एक दार्शनिक को गधा बनाने की अद्वितीय क्षमता रखता है। इस औषधि का सेवन करने के बाद मनुष्य को ब्रह्मांड के रहस्य समझ आने लगते हैं, भले ही उसे अपना घर का रास्ता याद न हो।” भांग के नशे में झूमते लोग सड़क पर ऐसे लोट रहे थे जैसे वे धरती की गोलाई को अपने शरीर से नापना चाह रहे हों।read more:https://pahaltoday.com/crude-oil-prices-are-out-of-control-due-to-the-war-what-is-the-real-reason-behind-the-war-and-when-will-it-end/अचानक प्रोफेसर के दरवाजे पर ऐसी दस्तक हुई जैसे कोई दैत्य भीतर आने को बेताब हो। यह ‘मूर्ख मंडली’ के सेनापति, तिवारी जी थे, जिनका पूरा शरीर काले और चांदी जैसे पेंट से पुता हुआ था। वे किसी अंतरिक्ष यात्री की तरह दिख रहे थे जो मंगल ग्रह से सीधे नाली में गिरा हो। तिवारी जी चिल्लाए, “प्रोफेसर साहब, बाहर आइए! आज ज्ञान की नहीं, गुलाल की बारी है। ‘बुरा न मानो होली है’!” प्रोफेसर ने दरवाजे के पीछे से दहाड़ते हुए कहा, “तिवारी जी, यह ‘बुरा न मानो’ वाक्यांश भारतीय दंड संहिता की समस्त धाराओं को चुनौती देने वाला सबसे निर्लज्ज जुमला है। क्या इस वाक्य को बोलकर आप किसी की हत्या भी कर सकते हैं और उम्मीद करेंगे कि वह मुस्कुराकर मर जाए?” लेकिन तर्क और बुद्धि का यहाँ कोई मोल नहीं था। तिवारी जी ने धमकी दी कि यदि दरवाजा नहीं खुला, तो वे पाइप के जरिए ‘रंगीन हमला’ करेंगे, जो प्रोफेसर की सफेद दीवारों को हमेशा के लिए ‘सांस्कृतिक’ बना देगा।डर के मारे प्रोफेसर ने जैसे ही दरवाजा थोड़ा सा खोला ताकि वे उन्हें समझा सकें, तिवारी जी की फौज ने ‘सांस्कृतिक आक्रमण’ कर दिया। प्रोफेसर गजानन, जो सुबह तक जोनाथन स्विफ्ट के वंशज लग रहे थे, पलक झपकते ही ‘इंद्रधनुषी मुर्गे’ में तब्दील हो गए। उनके चेहरे पर लाल, नीला और हरा रंग इस प्रकार मिलाया गया कि वे स्वयं को आईने में देखते तो शायद डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को ही खारिज कर देते। डॉ. विचलित, जो प्रोफेसर को बचाने आए थे, उन्हें पकड़कर जबरन ‘भांग मिश्रित ठंडाई’ पिला दी गई। डॉ. विचलित ने तीन घूँट पीते ही घोषणा की, “मित्रों, फ्रायड गलत था! मनुष्य की दमित इच्छाएँ लिबिडो में नहीं, बल्कि होली की बाल्टी में छिपी होती हैं।” प्रोफेसर गजानन, जिनकी आँखों में पहले घृणा थी, अब उनमें एक अजीब सी चमक (या शायद भांग का नशा) दिखाई देने लगी थी।read more:https://pahaltoday.com/crude-oil-prices-are-out-of-control-due-to-the-war-what-is-the-real-reason-behind-the-war-and-when-will-it-end/ अगले एक घंटे में ‘विद्वान विला’ का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका था। प्रोफेसर गजानन, जो समाज की मूर्खता पर निबंध लिख रहे थे, अब अपनी फटी हुई बनियान पहनकर ‘नागिन डांस’ का अभ्यास कर रहे थे। उन्होंने डॉ. विचलित का हाथ पकड़कर कहा, “डॉक्टर, सच तो यह है कि सभ्यता एक बोझ है और पेंट पहनना एक पाखंड! देखो, इस नाली के पानी में कितनी शीतलता है।” विवेक के वे दोनों स्तंभ अब ताश की गड्डी की तरह ढह चुके थे। यह उस महान पतन का उत्सव था जिसे समाज ‘भाईचारा’ कहता है। प्रोफेसर को अब रंगों में रसायन नहीं, बल्कि ‘दिव्य आभा’ नज़र आ रही थी और वे हर आने-जाने वाले को गले लगाकर उसे ‘बुद्धिजीवी’ घोषित कर रहे थे।भोजन के समय, ‘गुजिया’ का वह दौर चला जिसने मधुमेह के डर को भी इतिहास बना दिया। प्रोफेसर ने रिकॉर्ड तोड़ गुजिया खाते हुए तर्क दिया कि चीनी और मैदा का यह मिश्रण वास्तव में मस्तिष्क की कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने का एक प्राचीन फॉर्मूला है। लोग एक-दूसरे को मिठाई नहीं, बल्कि कोलेस्ट्रॉल की पुड़िया खिला रहे थे, पर ‘बुरा न मानो’ के मंत्र ने हर बीमारी को ‘प्रसाद’ बना दिया था। शाम तक प्रोफेसर के घर में इतने मेहमान आ चुके थे कि पैर रखने की जगह नहीं थी, और हर मेहमान अपने साथ रंगों की एक नई ‘वैरायटी’ लेकर आया था। प्रोफेसर की सफेद दीवारें अब किसी अमूर्त कलाकार की पेंटिंग लग रही थीं, जहाँ हर धब्बा एक ‘बौद्धिक विफलता’ की गवाही दे रहा था। समाज के सभी नियमों को ताक पर रखकर, वे सभी एक ऐसी सामूहिक बेहोशी का आनंद ले रहे थे जो केवल होली ही प्रदान कर सकती है।साँझ ढली, तो रंग कुछ उतरने लगा और बुद्धि धीरे-धीरे वापस अपनी जगह लौटने लगी। प्रोफेसर गजानन ने आईने में अपनी शक्ल देखी—चेहरे पर चांदी जैसा चमकता पेंट और आँखों के नीचे गहरा काला रंग। उन्होंने ठंडी साँस ली और डॉ. विचलित से कहा, “डॉक्टर, हमने आज जो किया, वह समाजशास्त्र का एक महान प्रयोग था। हमने स्वयं को मूर्ख बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि संसार में बुद्धिमान बने रहना सबसे कठिन सजा है। होली वह सुरक्षा वाल्व है, जो साल भर की दबी हुई इंसानियत और पागलपन को बाहर निकाल देती है ताकि हम अगले साल फिर से ‘सभ्य’ होने का नाटक कर सकें।” डॉ. विचलित ने सहमति में सिर हिलाया, हालाँकि वे अभी भी अपनी जेब में एक सूखी हुई गुजिया छिपाए हुए थे। अंततः, यह स्वीकार किया गया कि मनुष्य एक तर्कसंगत प्राणी नहीं, बल्कि एक ‘रंगीन जानवर’ है, जिसे साल में एक बार अपनी असलियत दिखाने की अनुमति समाज स्वयं देता है।

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