सलीम अहमद -गाजीपुर जमानियां। पवित्र रमजान माह के तीसरे जुमे पर क्षेत्र की मस्जिदों में अकीदतमंदों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। नमाज के दौरान मस्जिदें नमाजियों से खचाखच भर गईं, जिसके चलते कई स्थानों पर लोगों ने मस्जिद की छतों और आसपास की सड़कों पर भी नमाज अदा की। उलेमाओं ने रमजान की फजीलत बयान करते हुए अधिक से अधिक इबादत कर सवाब हासिल करने की ताकीद की।तीसरे जुमे के मौके पर सुबह से ही नमाज की तैयारियां शुरू हो गई थीं। नमाज का समय नजदीक आते ही लोग बड़ी संख्या में मस्जिदों की ओर रुख करने लगे। नगर की शाही जामा मस्जिद में दोपहर करीब 12:30 बजे से ही नमाजियों का पहुंचना शुरू हो गया था और एक बजे से पहले ही मस्जिद पूरी तरह भर गई। जगह कम पड़ने पर लोगों ने मस्जिद की छत पर भी नमाज अदा की। नमाज कारी शमशुल खिजिरपुर ने अदा कराई।तकरीर के दौरान कारी शमशुल ने कहा कि रमजान माह का दूसरा अशरा समाप्ति की ओर है और इसके बाद जहन्नुम से निजात का तीसरा अशरा शुरू होगा। उन्होंने बताया कि रमजान के आखिरी दस दिनों में नबी-ए-करीम ने एतकाफ फरमाया था और यही परंपरा आज भी जारी है। अल्लाह की रजा हासिल करने के लिए इबादत की नियत से मस्जिद में ठहरने को एतकाफ कहा जाता है।read more:https://pahaltoday.com/bus-hits-eeco-car-on-yamuna-expressway-6-killed-and-13-injured/
उन्होंने बताया कि एतकाफ तीन प्रकार का होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी मन्नत के तौर पर एतकाफ करने की नीयत करता है और उसका काम पूरा हो जाता है, तो उसके लिए एतकाफ करना वाजिब हो जाता है और रोजा रखना भी जरूरी होता है। इसके अलावा मस्जिद में थोड़ी देर के लिए भी एतकाफ की नियत कर ली जाए तो सवाब मिलता है। उन्होंने कहा कि मोहल्ले में कम से कम एक व्यक्ति को एतकाफ अवश्य करना चाहिए और एतकाफ करने वाले को सूरज डूबने से पहले मस्जिद में दाखिल हो जाना चाहिए, जहां पांच वक्त की नमाज जमात के साथ होती हो।
शाही जामा मस्जिद के सेक्रेटरी मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि महिलाएं घर में किसी निर्धारित स्थान पर एतकाफ कर सकती हैं। एतकाफ के दौरान खाना-पीना, आराम और इबादत मस्जिद के भीतर ही की जाती है। इस दौरान तिलावत, तौबा और इबादत पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिससे इंसान गुनाहों से बचा रहता है।
वहीं नूरी मस्जिद के इमाम असरफ करीम कादरी ने कहा कि रमजान के तीसरे जुमे पर मस्जिदों में अकीदतमंदों की भारी भीड़ उमड़ी और सभी मस्जिदें नमाजियों से भर गईं। उलेमाओं ने रोजे की फजीलत और तीसरे अशरे (निजात के अशरे) के महत्व पर प्रकाश डाला तथा देश-दुनिया में अमन-चैन और भाईचारे के लिए दुआएं कीं।