नई दिल्ली।नदी पुनर्जीवन संबंधी केंद्रीय निगरानी समिति (सीएमसी) की 21वीं बैठक आज जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन विभाग के सचिव श्री वीएल कंथा राव की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक श्री राजीव कुमार मित्तल सहित वरिष्ठ अधिकारियों, एनएमसीजी के अन्य अधिकारियों और राज्य सरकारों तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।समिति ने सीपीसीबी की 2025 की रिपोर्ट के आधार पर प्रदूषित नदी क्षेत्रों की नवीनतम स्थिति की समीक्षा की और स्वीकृत कार्य योजनाओं के कार्यान्वयन में राज्यों द्वारा की गई प्रगति का आकलन किया। अध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि नदी के जल की गुणवत्ता में सतत सुधार न केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण पर बल्कि उसके प्रभावी उपयोग, नियामक अनुपालन और समय पर परियोजना निष्पादन पर भी निर्भर करता है। प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सीवेज उपचार की कमियों को दूर करना, मौजूदा सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी) के प्रदर्शन में सुधार करना, चल रही और निविदाकृत एसटीपी परियोजनाओं और सीवेज नेटवर्क के विकास से संबंधित कार्यों में तेजी लाना, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण को मजबूत करना, उपचारित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को बढ़ाना और बाढ़ के मैदानों के सीमांकन में तेजी लाना शामिल थे। सचिव ने राज्यों को प्रदूषण नियंत्रण प्रयासों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए वास्तविक समय की निगरानी को सक्षम करने का भी निर्देश दिया।2018, 2022 और 2025 में पहचाने गए प्रदूषित नदी क्षेत्रों की तुलनात्मक समीक्षा से पता चला कि 2018 से प्रदूषित क्षेत्रों की कुल संख्या में लगातार कमी आई है। हालांकि, समिति ने पाया कि कुछ राज्यों ने नए प्रदूषित क्षेत्रों के जुडऩे और विशिष्ट नदी खंडों में गिरावट की सूचना दी है, जिसके लिए लक्षित सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है। समिति ने उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, ओडिशा, जम्मू और कश्मीर और पंजाब के संबंध में सीवेज उपचार संयंत्रों, क्षमता उपयोग, बाढ़क्षेत्र जोनिंग, उपचारित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग और नदी पुनर्जीवन समितियों के माध्यम से संस्थागत निगरानी पर हुई प्रगति की समीक्षा की।बैठक का समापन राज्यों से नदी पुनर्जीवन के लिए समयबद्ध, परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाने के आह्वान के साथ हुआ, जिसमें परिचालन दक्षता, अंतर-विभागीय समन्वय और दीर्घकालिक जल गुणवत्ता सुधार प्राप्त करने के लिए निरंतर अनुपालन पर जोर दिया गया।