Sat. Aug 24th, 2019
शिशु की आँखों की देखभाल से सुरक्षित करें आँखों की रोशनी

शिशु की आँखों की देखभाल से सुरक्षित करें आँखों की रोशनी

शिशु की आँखों की देखभाल से सुरक्षित करें आँखों की रोशनी
डॉ. रितिका सचदेव

एडिशनल डायरेक्टर

सेंटर फॉर साइट, नई दिल्ली

आमतौर पर शिशु की आंखें व्यस्क की अपेक्षा छोटी होती हैं. शिशु की आंखों को व्यस्क की आंखों के बराबर विकसित होने में लगभग दो वर्ष का समय लगता है. नवजात शिशुओं की आंखों में संक्रमण कोई असाधरण बात नहीं है. पैदा होने से लेकर तीन सप्ताह तक शिशु नियोनैटल कंजक्टिवाइटिस का शिकार हो सकता है. इसके लक्षण स्वरूप शिशु की आंख लाल रहती है और निरंतर पानी निकलता रहता है. इस संक्रमण को नेत्र विशेषज्ञ द्वारा दी गई एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है.

आंखों में से निरंतर पानी गिरना और तरल मात्रा में डिस्चार्ज की समस्या कई बच्चों में आमतौर पर पाई जाती है. शिशु के जन्म के बाद लगभग चार सप्ताह तक बच्चों की आंख में आंसू कम बनतेे हैं इसलिए आंख से किसी भी प्रकार का पानी आना आसाधरण और हानिकारक होता है. जन्म के समय आंख से पानी आने का मतलब संक्रमण होता है, लेकिन शिशु के तीन महीने या उससे अधिक के हो जाने पर ऐसे लक्षणों का उभरना आंसू-प्रणाली का रूक जाना माना जाता है.

पलक में किसी भी प्रकार की विषमता को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कोलोबोमा वह अवस्था है जब पलक का कोई भाग अनुपस्थित हो. दरअसल, पलक कोर्निया का 1-2 मिमी भाग ढक़ते हैं. लेकिन किसी शिशु में अगर ये ज्यादा भाग को ढक़ते हों तो यह स्थिति पलक का लटकना कहलाती है. इसलिए शिशु की आंखों की हर गतिविधि को ध्यान से देखना चाहिए. अगर गतिविधि में कोई रूकावट हो तो यह अवस्था नर्व पाल्सी कहलाती है.
समय से पहले जन्मे बच्चों में आर ओ पी या रेटिनोपैथी आफ प्रीमैज्युरिटी होने का खतरा अधिक होता है।
प्रस्तुति – उमेश कुमार सिंह

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