असंगठित क्षेत्र के श्रमिक: राजेश मिश्र

असंगठित क्षेत्र के श्रमिक: राजेश मिश्र

असंगठित क्षेत्र के श्रमिक: राजेश मिश्र

(राजेश मिश्र,  हिन्दू श्रमिक महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

 प्राथमिक और द्वितीयक उद्योगों में अधिकांश कार्य ठेका श्रमिकों द्वारा किया जाता है। तेज़ी से बढ़ते सेवा क्षेत्र के लगभग सभी कर्मचारी असंगठित क्षेत्र में हैं। असंगठित क्षेत्र के कर्मियों का बड़ा हिस्सा प्रवासी श्रमिक हैं। इन्हें ठेकेदारों द्वारा दूरदराज़ के क्षेत्रों से लाया जाता है। वे अक्सर कार्यस्थल पर या उसके नज़दीक अस्थायी आवासों में रहते हैं। उनके रोज़गार की कोई सुरक्षा नहीं होती और कई बार उन्हें वह वेतन नहीं दिया जाता, जिसका वायदा उन्हें किया जाता है। उन्हें शुरूआत में कुछ पेशगी दी जाती है और बाद में काम के अनुसार भुगतान होता है। इस कारण कई बार ये श्रमिक दिन में बारह या उससे भी अधिक काम करते हैं। हमारी सरकारें शिक्षा के अधिकार के बारे में कुछ भी कहें परंतु तथ्य यह है कि बाल श्रमिकों की संख्या बढ़ रही है। कई नए औद्योगिक उपक्रमों में केवल किशोर लड़कियों को नियोजित किया जा रहा है। इससे ऐसा लगता है कि उद्योगपतियों को कम उम्र की महिलाओं से काम लेना अधिक आसान लगता है।

भारतीय श्रमिक वर्ग का यह विभाजन दरअसल भारतीय समाज के विभाजन को प्रतिबिंबित करता है। संगठित क्षेत्र में काम करने वाले अधिकांश श्रमिक या तो ऊँची जातियों के हैं या ओबीसी के ऊपर की ओर बढ़ते तबकों के। असंगठित क्षेत्र में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और निम्न ओबीसी वर्गों का बाहुल्य है। उन्हें यदि बहुत कम वेतन दिया जाता है और उनके काम करने के हालात यदि बहुत खराब हैं तो इसके पीछे भी जाति व्यवस्था से उपजी सोच, है जिसमें शारीरिक श्रम को निचली श्रेणी का और शूद्रों अछूतों के लिए उपयुक्त काम माना जाता है। ऊँची जातियों के सदस्य केवल साफ-सुथरे, प्रबंधकीय कार्य करते हैं। पुराना सामंती जातिगत ढांचा आज की तथाकथित आधुनिक दुनिया में एक नए रूप में हमारे सामने उपस्थित है।

 

इस विरोधाभास को समझकर ही हम भविष्य के अपने संघर्ष का रास्ता निर्धारित कर सकते हैं। नागरिक समाज का एक बड़ा तबका, जिसमें ऊँची जातियों का बोलबाला है, यह अपेक्षा करता है कि स्थापित श्रमिक संगठन, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को संगठित करें। यह सोच बेमानी है। इन श्रमिक संगठनों ने तो आज तक ऐसा किया है और ना ही वे भविष्य में ऐसा करेंगे। स्थापित श्रमिक संघ-चाहे उनकी राजनैतिक वफादारियां कुछ भी हों-केवल संगठित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी दुनिया बैंकों, जीवन बीमा कंपनियों और रेलवे के कर्मचारियों तक सीमित है। श्रमिक वर्ग के इस तबके और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के बीच एक बहुत गहरी खाई है। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि बैंक कर्मचारियों की ट्रेड यूनियनों के नेता भी अपने घर पर काम करने वालों को उचित वेतन देते होंगे। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कार्यरत कर्मचारी यदि मोटा वेतन पा रहे हैं तो इसके पीछे ठेका श्रमिकों का खून-पसीना है।

Loading...