भारत का मजदूर आंदोलन : राजेश मिश्र

भारत का मजदूर आंदोलन : राजेश मिश्र

भारत का मजदूर आंदोलन : राजेश मिश्र

(राजेश मिश्रहिन्दू श्रमिक महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

 

भारत सहित पूरी दुनिया में ज्यादातर मजदूर संगठन समाजवाद, सामाजिक न्यायवाद, कल्याणवाद सरीखी प्रगतिशील विचारधाराओं से सम्बद्ध होते हैं. मजदूर संगठन मजदूरों के वेतन-बोनस, सेवा-शर्तों, काम के घंटों, काम करने की स्थितियों आदि मुद्दों पर सरकारों अथवा/और कारखाना मालिकों से संवाद, और जरूरत पड़ने पर मजदूर-वर्ग के हित में संघर्ष करते हैं. बड़े मजदूर संगठनों की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रम कानूनों के निर्माण/बदलाव में भी भूमिका होती है. कहने की जरूरत नहीं कि भारत का मजदूर आंदोलन लंबे समय से गतिरोध का शिकार हो चुका है.

1991 में नई आर्थिक नीतियां किसानों और मजदूरों पर सीधे-सीधे थोपी गई थीं. नई आर्थिक नीतियों के साथ देश में सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त कर उसकी कीमत पर निजी क्षेत्र को स्थापित करने की शुरुआत हुई थी. वह देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था (पोलिटिकल इकॉनमी) में एक प्रतिमान विस्थापन (पेराडाइम शिफ्ट) था.

सीधे शब्दों में, देश की अर्थव्यवस्था को संविधान की धुरी से उतार कर बाजार अर्थव्यवस्था (मार्केट इकॉनमी) के पुरोधा प्रतिष्ठानोंविश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन आदि) की धुरी पर चढ़ा दिया गया था.

कोई भी अर्थव्यवस्था राजनीति के बाहर नहीं हो सकती. लिहाज़ा, जल्दी ही देश की राजनीति और नेतृत्व कमोबेश बाज़ार अर्थव्यवस्था का वाहक बनते चले गए.

1991 वह अवसर था जब मजदूर आंदोलन को नए चरण में प्रवेश करना चाहिए था. लेकिन राजनीतिक पार्टियों से जुड़े अथवा स्वतंत्र मजदूर संगठन नेतृत्व ने यह जिम्मेदारी नहीं उठाई. सरकारेंरिफॉर्म्सके नाम पर एक के बाद एक श्रम कानूनों को कारपोरेट घरानों के पक्ष में बदलती रहीं और मजदूर संगठन कुछ रस्मी प्रतिरोध करके बैठ जाते रहे. नतीजतन, भारत का मजदूर-वर्ग भी लगभग वैसा ही अराजनीतिक बनता गया है, जैसा बाकी समाज बना है. अराजनीतिकरण के चलते आधुनिक पहनावे और जीवन-शैली में लिपटा भारत का ज्यादातर पढ़ा-लिखा मध्य-वर्ग समानता के आधुनिक मूल्य को स्वीकार नहीं करता; समाज का वह हिस्सा भी नहीं, जो सामाजिक न्याय के संवैधानिक प्रावधानों के तहत मध्य-वर्ग में दाखिल हुआ है.

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