जाति व्यवस्था, दरअसल, श्रम विभाजन: राजेश मिश्र

जाति व्यवस्था, दरअसल, श्रम विभाजन: राजेश मिश्र

जाति व्यवस्था, दरअसल, श्रम विभाजन: राजेश मिश्र

 

(राजेश मिश्रहिन्दू श्रमिक महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

मार्क्स और आंबेडकर का मिलन जरूरीयह एक ऐतिहासिक त्रासदी है कि भारतीय राजनीति की दो क्रांतिकारी धाराएं पिछली एक सदी से अलग-अलग बह रही हैं। वामपंथी पार्टियां- जिनमें संसदीय लोकतंत्र में भागीदारी करने वाली पार्टियों से लेकर चरम वामपंथी तक शामिल हैं-आज तक यह नहीं स्वीकार कर पाई हैं कि भारत में अगर कोई क्रांति होगी तो जाति अनिवार्यतः उसका केन्द्रीय तत्व होगी। दूसरी ओर, दलित आंदोलन, मेहनतकश वर्ग के मुद्दों को नज़रअंदाज़ करता रहा है। वह इस बात को समझने को तैयार नहीं है कि जाति व्यवस्था, दरअसल, श्रम विभाजन (या श्रमिकों का विभाजन) है। इन दोनों विचारधाराओं को एकसाथ लाना, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के आंदोलन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है।

हमारी दृष्टि में इसके लिए निम्न कार्य करने होंगे :

-किन इलाकों से पलायन होता है और पलायनकर्ता कहां जाते हैं, उन स्थानों की पहचान करना।

- स्रोत और गंतव्य दोनों क्षेत्रों में काम करना।

-प्रवासी मजदूरों के उनके निवासस्थानों से कार्यस्थल पर पहुंचने और फिर कार्यस्थल से वापिस अपने निवास जाने की पूरी प्रक्रिया पर नजर रखना।

- जहां संभव हो वहां श्रम ठेकेदारों से संपर्क स्थापित कर उनके साथ कार्य करना।

-श्रमिकों के कार्यस्थल के क्षेत्रो में प्रगतिशील ताकतों के साथ गठजोड़ बनाना।

-राज्य तंत्र से संबंधित मुद्दों पर बातचीत करना।

 

 

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