सावरकर का हिंदुत्व, हिंद-स्वराज की रचना

सावरकर का हिंदुत्व, हिंद-स्वराज की रचना

सावरकर का हिंदुत्व, हिंद-स्वराज’ की रचना

राजेश मिश्र,  हिन्दू श्रमिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

हिंद-स्वराज’ की रचना गांधी ने लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज पर की थीऔर यह पहली दफा दक्षिण अफ्रीका से ही छपने वाले इंडियन ओपिनियन में प्रकाशित हुई थी. गांधी के अनुसार लंदन में रहने वाले अराजकतावादी, अतिवादी और हिंसक प्रवृति के लगभग सभी प्रमुख हिन्दुस्तानियों से उनकी मुलाकात हुई थी. इस मुलाकात के बाद गांधी ने महसूस किया वे सही राह पर नहीं हैं और उनके रास्ते हिंदुस्तान में स्वराज नहीं सकता.

गांधी का मन उद्विग्न था. उन अतिवादियों और हिंसावादियों को इकट्ठे जवाब देने के खयाल से ही 72 पेज की यह किताब लिखी गयी थी. किताब प्रश्नोत्तर शैली में लिखी गयी है. गांधी ने प्रस्तावना में इसकी विशेषता भी रेखांकित कर दी है- ‘यह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखलाती हैहिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती हैपशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है.’

सावरकर की यह किताब उनके समस्त विचारों की कुंजिका हैजैसे गांधी की ‘हिंद-स्वराज’ है. गांधी ने हिंद स्वराज में व्यक्त कुछ विचारों से बाद के दिनों में स्वयं को अलग भी कियाजैसे पार्लियामेंट्री ढांंचे की सख्त आलोचना करने वाले गांधी बाद में उसके प्रस्तावक बन गए. लेकिन सावरकर अपने विचारों पर आखिर तक कायम रहे. गांधी-हत्या काण्ड में नाथूराम गोडसे के साथ जिन लोगों को मुजरिम बनाया गया थाउनमें सावरकर भी थे. लेकिन वे कोर्ट से बरी कर दिए गए. उसके बाद से 1966 में अपनी मृत्यु तक वह उपेक्षित ही रहे.

लेकिन अपने विचारों को लेकर आज वह एक बार फिर विमर्श के केंद्र में हैं. सावरकर का हिंदुत्वगांधी के हिंद हिंदू से भिन्न हैबल्कि उनके ही शब्दों में हिन्दुवाद से भी भिन्न है. उनका हिन्दुस्थानजिसे भारत कहना उन्हें नापसंद हैउनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि है. पुण्यभूमि की बात करते ही वे उन धर्मावलंबियों को अलगाव में डाल देते हैं, जिन धर्मों की स्थापना भारतीय भूगोल के बाहर हुई. उनकी आज़ादी की लड़ाई केवल अंग्रेजों से बल्कि मुसलमानों और ईसाईयों से भी है. गांधी की तरह वह अहिंसा में विश्वास नहीं करते. बुद्ध उन्हें प्रिय हैंक्योंकि वह ज्ञानी थेलेकिन उनके की कारण यह देश गुलाम हुआउनका ऐसा मानना था. उनके ही शब्दों में- ‘उनका गौरव हमारा हैतो पतन भी तो हमारा है’.

 

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