सावरकर का हिंदुत्व

सावरकर का हिंदुत्व

सावरकर का हिंदुत्व

राजेश मिश्र

( हिन्दू श्रमिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)



'हिंदुत्व' भारत में 'हिंदू राष्ट्रवाद' का प्रमुख 'कार्य' है. 'हिंदुत्व' पद का प्रयोग या निर्माण 19वीं शताब्दी का है. पहली बार 1870 के दशक में बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंद मठ' में यह आया. सन 1890 के दशक में यह शब्द चलन में था- बंगाल में चंद्रनाथ बसु और महाराष्ट्र में तिलक के यहां. सावरकर ने 'हिंदुत्व' का प्रयोग अपनी विचारधारा की रूपरेखा बनाने के क्रम में किया. उसके बाद 'हिंदुत्व' सामान्य शब्द और पद न रहकर विचारधारा से जुड़ गया. सावरकर ने हिंदू जीवन-पद्धति को अन्य जीवन पद्धतियों से अलग और विशिष्ट रूप में प्रस्तुत किया. वह 'हिंदुत्व' विचारधारा के प्रवर्तक और सिद्धांतकार बने. सारी बहसें इस विचारदृष्टि को लेकर है. इसके समर्थकों की संख्या आज कहीं अधिक है और भारत का लगभग पूरा बौद्धिक वर्ग इस विचारधारा का विरोधी है.
सावरकर के राजनीतिक जीवन के तीन चरण हैं. पहला चरण उन्हें ब्रिटिश सत्ता द्वारा की गयी आजीवन सजा तक (1910) की है, दूसरा चरण 1911 से 1936 तक और तीसरा चरण 1937 से है, जब वे 'हिंदू महासभा' के अध्यक्ष बने. पहले चरण में सावरकर सबसे बड़े क्रांतिकारी के रूप में हैं. यह उनके जीवन और व्यक्तित्व का 'वीर' पक्ष है. इस दौर में उनमें क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्रवाद के बीच एक संतुलन है. वे 'हिंदू राष्ट्रवाद' की अवधारणा को प्रतिपादित करनेवाले पहले व्यक्ति नहीं हैं.
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में जन्मा हिंदू राष्ट्रवाद ब्रिटिशों को दिये गये प्रत्युत्तर के रूप में था, जहां प्राचीन भारत का गौरव गान और अपनी श्रेष्ठिता का बोध था. सावरकर की विशेषता यह है कि उन्होंने इस विचारधारा को विधिबद्ध और संहिताबद्ध किया. यह उनके राजनीतिक जीवन के दूसरे चरण में संभव हुआ.
पहले से उनके मस्तिष्क में जो विचार घुमड़ रहे थे, उसे उन्होंने सेल्युलर जेल में संहिताबद्ध (कोडिफाई) किया. उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में विवेकानंद ने भारत को 'पुण्यभूमि' के रूप में देखा. विवेकानंद के यहां आध्यात्मिक पक्ष पर बल है, पर सावरकर के यहां 'राष्ट्र' और 'भारत' का 'कंसेप्ट' विवेकानंद से भिन्न है. सावरकर ने अगर 'हिंदुत्व : हू इज हिंदू' पुस्तक ने सब कुछ बदल डाला. यह सावरकर की एक वैचारिक पैम्फ्लैट है, जो 1923 में 'एसेंसिएल्स ऑफ हिंदुत्व' शीर्षक से प्रकाशित हुई, जिसका 1928 में प्रकाशन दूसरे शीर्षक 'हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू' से हुआ. इसका दूसरा संस्करण 1942 में आया.
सावरकर के 'हिंदुत्व' की धारणा ने 'हिंदू राष्ट्रवाद' की आधारशिला रखी. हिंदू राष्ट्रवाद 'एथनिक' राष्ट्रवाद का एक रूप है. सावरकर ने 'पुण्यभूमि' और 'पितृभूमि' या 'मातृभूमि' में अंतर किया और यह माना कि जो 'हिंदू' नहीं है, वह भारत को अपना 'राष्ट्र' नहीं कह सकता. जिनकी पुण्यभूमि दूसरे देशों में है- मुस्लिम, ईसाई, यहूदी आदि की, उनका राष्ट्र भारत नहीं है.
उन्होंने धर्म और संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा. 'हिंदुत्व' को उन्होंने एक 'राजनीतिक कंस्ट्रक्ट' बनाया. सावरकर की यह विचार दृष्टि या विचारधारा नागपुर में 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार के पास पहुंची और उन्होंने 'हिंदुत्व' को प्रेरक और प्रेरणात्मक माना.
सावरकर से हेडगेवार ने रत्नागिरि में भेंट की और उनसे हिंदू राष्ट्र को व्यवस्थित करने के लिए बातचीत की. इसी के बाद आरएसएस का जन्म हुआ और छब्बीस वर्षों बाद इस विचारधारा का राजनीतिक दल 'भारतीय जनसंघ' का जन्म हुआ.

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