श्रम की गरिमा की पुनर्स्थापना -राजेश मिश्र

श्रम की गरिमा की पुनर्स्थापना -राजेश मिश्र

श्रम की गरिमा की पुनर्स्थापना -राजेश मिश्र

(राजेश मिश्रहिन्दू श्रमिक महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

 

 श्रम विभाजन के चलते, अधिकांश समाजों में शारीरिक श्रम को निचली निगाहों से देखा जाता है। भारत में जातिगत आधार पर श्रम विभाजन ने शारीरिक श्रम के दर्जे को और नीचा कर दिया है। पहले इस तरह की सोच दुनिया के सभी समाजों में थी परंतु शनैः-शनैः सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों के साथ यह समाप्त हो गई। भारतीय समाज में यह अब भी जिन्दा है। मध्यम वर्ग के लोग आज भी झाड़ू लगाना या बर्तन मांजना पसंद नहीं करते। उन्हें ऐसा लगता है कि यह काम नीची जातियों की मुख्यतः महिलाओं का है। यह ज़रूरी है कि हम श्रम की गरिमा को पुनस्र्थापित करें और शारीरिक श्रम टेबिल पर बैठकर किए जाने वाले काम के लिए मिलने वाले वेतन के बीच के अंतर को कम करने का प्रयास करें।

अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों का संगठन- भारत के श्रमबल की प्रकृति तेजी से बदल रही है। अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत अधिकांश श्रमिक प्रवासी होते हैं, जो हर वर्ष एक निश्चित समय पर अपने परिवार सहित काम की तलाश में अपने गांवों से निकल पड़ते हैं। इन लोगों की भर्ती ठेकेदार करते हैं और हर साल ये श्रमिक बदलते रहते हैं। अतः इनको संगठित करने के लिए श्रमिकों को एकजुट करने के पुराने तरीके काम नहीं आएंगे। इसके लिए एक नए तरीके का विकास करना आवश्यक है।

जाति व्यवस्था को तोड़ना -असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के समकक्ष लाने के लिए जाति व्यवस्था को तोड़ना जरूरी है। यह असंभव नहीं है। एक समय था जब जाति व्यवस्था का ध्वंस, जागरूक लोकमत के एजेण्डे पर था। आंबेडकर ने ‘‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’’ शीर्षक का अपना प्रबंध, जांतपांत तोड़क मंडल के वार्षिक अधिवेशन में भाषण देने के लिए तैयार किया था। करीब 100 साल पहले, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों के समानांतर सोशल कांग्रेस के सत्र भी हुआ करते थे, जो सामाजिक मुद्दों पर केन्द्रित होते थे। जाति के ध्वंस को सार्वजनिक एजेण्डे पर फिर से लाए जाने की जरूरत है।

 

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