बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत - राजेश मिश्र

बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत - राजेश मिश्र

बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत - राजेश मिश्र
(राजेश मिश्र,  हिन्दू श्रमिक महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )
-    शासकीय कर्मचारी, श्रमिक वर्ग का सबसे संगठित तबका है। उन्हें नाराज़ करने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता।
-    भारत में ढेर सारे श्रम कानून हैं।
-     कई प्रगतिशील राज्यों ने अपने-अपने श्रम कानून भी बनाए हैं परंतु इन श्रम कानूनों का लाभ भारतीय श्रमिक वर्ग का केवल एक छोटा सा तबका उठा रहा है।
लखनऊ (पहल टुडे): भारतीय श्रमिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। अधिकांश जानकार यह कहते हैं कि 90 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इस तरह, भारतीय श्रमिक वर्ग में एक बहुत गहरी विभाजक रेखा है। एक ओर संगठित क्षेत्र है, जिसमें काम करने वालों को रोज़गार की पूर्ण सुरक्षा प्राप्त है और उन्हें विभिन्न श्रमिक कानूनों के प्रावधानों का लाभ भी मिल रहा है। दूसरी ओर, श्रमिकों का एक बड़ा तबका मुश्किल हालातों में काम कर रहा है और उसे किसी तरह की कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है। असंगठित क्षेत्र के अधिकांश श्रमिक, बंधुआ मज़दूर प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम में परिभाषित ‘बंधुआ’ की श्रेणी में आते हैं। इसे एक तरह की आधुनिक गुलामी कहा जा सकता है।
भारत में ढेर सारे श्रम कानून हैं। कई प्रगतिशील राज्यों ने अपने-अपने श्रम कानून भी बनाए हैं परंतु इन श्रम कानूनों का लाभ भारतीय श्रमिक वर्ग का केवल एक छोटा सा तबका उठा रहा है। यह विडंबना ही है कि इन कानूनों से लाभांवित होने वाले वर्ग वे हैं, जिनकी इन्हें सबसे कम आवश्यकता है। भारत के संगठित श्रमिक वर्ग में शासकीय उपक्रमों जैसे एयर इंडिया, राष्ट्रीयकृत बैंक, तेल कंपनियों व रेलवे जैसे सरकारी विभागों और कुछ बड़े निजी उद्यमों के कर्मी शामिल हैं। इन्हीं उपक्रमों में ठेकेदारों के ज़रिए नियुक्त श्रमिक भी हैं जिन्हें कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है और जिन्हें अक्सर नीची श्रेणी के काम करने होते हैं। इन उपक्रमों के श्रमिक संघ केवल नियमित कर्मचारियों के हितों का संरक्षण करते हैं और ठेका श्रमिकों की तनिक भी फिक्र नहीं करते।
शासकीय कर्मचारी, श्रमिक वर्ग का सबसे संगठित तबका है। उन्हें नाराज़ करने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता। अगर वे एकजुट हो जाएं तो वे राज्य सरकारों को बना या गिरा सकते हैं। एक समय था जब ऐसा माना जाता था कि सरकारी कर्मचारियों को बहुत कम वेतन मिलता है और इसे उनके भ्रष्टाचार में लिप्त होने का कारण और औचित्य भी बताया जाता था। अब ऐसा नहीं है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन, बाज़ार दर से कहीं ज्यादा है और केवल चुनिन्दा निजी क्षेत्र के कर्मचारियों से कुछ कम है। जहां तक भ्रष्टाचार का प्रश्न है, उसके बारे में जितना कहा जाए उतना कम है। अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसे न जाने कितने लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध की घोषणा की परंतु भ्रष्टाचार का दानव अब भी उतना ही शक्तिशाली है। मध्यम वर्ग के भारतीयों के लिए, भ्रष्टाचार जीवन का हिस्सा बन गया है।

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