पत्रकारिता के साथ-साथ वकालत की पढ़ाई भी की- राजेश मिश्र

पत्रकारिता के साथ-साथ वकालत की पढ़ाई भी की- राजेश मिश्र

पत्रकारिता के साथ-साथ वकालत की पढ़ाई भी की- राजेश मिश्र

(राजेश मिश्र,  हिन्दू श्रमिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )

सम्पादक की स्वतन्त्रता और लेखन की गरिमा के प्रबल समर्थक इस भारतीय मनीषा ने पत्रकारिता के साथ-साथ वकालत की पढ़ाई भी की और इस क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया   1899 . में मालवीयजी ने वकालत की परीक्षा पास की और हाइकोर्ट में प्रैक्टिस आरम्भ कर दी

स्वाभिमानी मालवीयजी अपने नियमों और सिद्धान्तों के इतने पक्के थे कि किसी भी हालत में झूठे मुकदमों की पैरवी नहीं करते थे   परन्तु कुछ समय पश्चात् सामाजिक कार्यों में व्यस्तता बढ़ जाने के कारण वकालत छोड़ दी परन्तु जब गोरखपुर के ऐतिहासिक चौरीचौरा काण्ड में 170 लोगों को फाँसी की सजा हुई तब उन्होंने वकालत छोड़ने के 20 वर्षों के अन्तराल के बावजूद भी इलाहाबाद हाइकोर्ट में अद्भुत बहस की और 150 लोगों को फाँसी से बचा लिया

इस मुकदमे में मालवीयजी ने इतने प्रभावशाली ढंग से आरोपियों की पैरवी की, कि उनसे प्रभावित होकर मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें अदालत में ही बधाई दे दी इसके अतिरिक्त, मालवीयजी ने विधवाओं के पुनर्विवाह का समर्थन और बाल विवाह का विरोध भी किया

इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा और उसने उत्तराखण्ड में गंगा की धारा पर कोई भी बाँध या फैक्ट्री बनाने का फैसला किया महामना ने अनेक रूपों में देश की सेवा की और अपने जीवन के अन्त तक किसी--किसी रूप में सक्रिय रहे, परन्तु बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की चर्चा किए बिना उनके योगदान का उल्लेख अधूरा है

मालवियजी शिक्षा के बिना व्यक्ति के विकास को असम्भव मानते थे   उनका कहना था- “शिक्षा के बिना मनुष्य पशुतुल्य होता है देश के युवक-युवतियों को देश में ही उच्च गुणवत्ता की शिक्षा देने के उद्देश्य से उन्होंने एक विश्वविद्यालय की स्थापना का सपना देखा और अपने इस सपने को 4 फरवरी, 1916 के दिन बनारस हिन्दू, विश्वविद्यालय का शिलान्यास करके साकार किया

वर्तमान समय में यह लगभग 30 हजार विद्यार्थियों और दो हजार प्रतिभाशाली अध्यापकों के साथ एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है अपने आरम्भ काल से ही शिक्षा-संस्कृति और बौद्धिक विमर्श का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा यह विश्वविद्यालय आज देश-विदेश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में गिना जाता है

मालवीयजी उच्च शिक्षा के आधुनिकतम विषयों, विज्ञान की विभिन्न शाखाओं और पद्धतियों के साथ ही भारतीय ज्ञान परम्परा-वेद, शास्त्र, दर्शन, साहित्य और कला के अध्ययन के वैश्विक केन्द्र बिंदु के रूप में इस विश्वविद्यालय को विकसित करना चाहते थे और ऐसा करने में वह सफल भी रहे

 

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