पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तारीखें अभी आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं हुई हैं, लेकिन राज्य की राजनीतिक बिसात पर शह और मात का खेल अपने चरम पर पहुंच चुका है। आम आदमी पार्टी द्वारा 31 अक्टूबर 2026 को अपने 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी किए जाने के ठीक बाद, पार्टी के भीतर सुलग रही असंतोष की चिंगारी एक बड़े विस्फोट में बदल गई है। अमृतसर नॉर्थ से विधायक और पूर्व आईपीएस अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह, समाना से विधायक व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री चेतन सिंह जौड़ामाजरा, और सनौर से विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा का एक साथ पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना केवल तीन विधायकों का इस्तीफा नहीं है, बल्कि यह भगवंत मान सरकार और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक गहरा राजनीतिक और नैतिक झटका है। नई दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में 2 नवंबर 2026 को जिस तरह इन नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई गई, उसने इस चर्चा को फिर से हवा दे दी है कि क्या पंजाब में भी भाजपा का बहुचर्चित ‘ऑपरेशन लोटस’ पूरी ताकत से सक्रिय हो चुका है।इस राजनीतिक उठापटक को समझने के लिए इसके कालक्रम और पृष्ठभूमि को देखना अनिवार्य है। विपक्षी खेमे और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पंजाब में आम आदमी पार्टी को कमजोर करने या सत्ता परिवर्तन की इस पटकथा की शुरुआत हाल-फिलहाल में नहीं हुई, बल्कि इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। मार्च 2024 और उसके बाद के महीनों में जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों का एक बड़ा धड़ा, जिसमें राघव चड्ढा और डॉ. संदीप पाठक जैसे प्रमुख चेहरे शामिल थे, धीरे-धीरे पार्टी लाइनों से दूर हुआ और बाद में 7 राज्यसभा सांसदों के एक गुट ने तकनीकी रूप से भाजपा के साथ विलय का रास्ता चुना, तभी से पंजाब की सत्ताधारी पार्टी के भीतर दरारें साफ दिखाई देने लगी थीं। उस समय भी मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इसे ‘गद्दारी’ करार दिया था और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में किया गया दलबदल बताया था। इसके बाद जब भगवंत मान सरकार ने जालंधर में अपना शक्ति प्रदर्शन करने के लिए विधायकों की बैठक बुलाई, तो 94 विधायकों में से केवल 65 विधायक ही वहां पहुंचे। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि पार्टी के लगभग 29 विधायक या तो नेतृत्व से नाराज थे या किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की तलाश में थे। अब, नवंबर 2026 की शुरुआत में तीन सिटिंग विधायकों का इस्तीफा देना इसी सिलसिले की अगली और अधिक आक्रामक कड़ी है।संसदीय लोकतंत्र में जब भी किसी राज्य में सत्ताधारी दल के विधायक विपक्षी दल में शामिल होते हैं, तो सत्ता पक्ष द्वारा इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ की संज्ञा दी जाती है। आम आदमी पार्टी का आरोप है कि भाजपा धनबल, बाहुबल और केंद्रीय जांच एजेंसियों जैसे प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के डर का इस्तेमाल कर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है। देश के राजनीतिक इतिहास में कर्नाटक, मध्य प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में सरकारों का गिरना या विधायकों का बड़े पैमाने पर दलबदल करना इस रणनीति का हिस्सा माना जाता रहा है। पंजाब के संदर्भ में भी, तीन विधायकों के भाजपा में जाने के बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका तर्क है कि पंजाब की जनता ने 2022 में आम आदमी पार्टी को 92 सीटों का प्रचंड बहुमत देकर बदलाव की जो जिम्मेदारी सौंपी थी, भाजपा उसे चोर दरवाजे से हथियाना चाहती है। हालांकि, इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पार्टी छोड़ने वाले विधायकों ने जो आरोप लगाए हैं, वे केवल राजनीतिक अवसरवाद की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे शासन और प्रशासन की गंभीर विफलताओं की ओर इशारा करते हैं।इस्तीफा देने वाले तीनों नेताओं—कुंवर विजय प्रताप, चेतन सिंह जौड़ामाजरा और हरमीत सिंह पठानमाजरा—ने मीडिया के सामने आकर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। कुंवर विजय प्रताप सिंह, जिन्होंने 2015 के कोटकपूरा और बहबल कलां गुरु ग्रंथ साहिब बेअदबी मामले की जांच करने वाली एसआईटी का नेतृत्व किया था, लंबे समय से आम आदमी पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट चल रहे थे। उनका आरोप है कि जिस बेअदबी मामले को सुलझाने और दोषियों को सजा दिलाने के वादे पर आम आदमी पार्टी सत्ता में आई थी, उस पर मान सरकार ने जानबूझकर ढीली पैरवी की और राजनीति की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंजाब के ‘स्कूल्स ऑफ एमिनेंस’ के दावों पर सवाल उठाए और राज्य में फैले माफिया राज की निंदा की। वहीं, पूर्व मंत्री चेतन सिंह जौड़ामाजरा और हरमीत सिंह पठानमाजरा ने सीधे तौर पर पंजाब में बढ़ते नशे (चिट्टा) के कारोबार, कानून-व्यवस्था के ध्वस्त होने, बेलगाम गैंगस्टर संस्कृति और राज्य पर बढ़ते ढाई लाख करोड़ रुपये के कर्ज को अपनी नाराजगी का कारण बताया। इन नेताओं का सबसे गंभीर आरोप यह है कि पंजाब की चुनी हुई सरकार को चंडीगढ़ से नहीं, बल्कि दिल्ली में बैठे कुछ खास लोगों और उनके सलाहकारों (जैसे विभव कुमार) द्वारा चलाया जा रहा है, जिससे स्थानीय विधायकों और मंत्रियों की गरिमा को ठेस पहुंची है।read more:https://pahaltoday.com/lodheshwar-mahadev-corridor-to-boost-pilgrimage-dr-dilip-agnihotri/इस मोड़ पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के कितने और विधायक या नेता भाजपा का दामन थाम सकते हैं? राजनीतिक गलियारों और खुफिया रिपोर्टों में यह चर्चा आम है कि आम आदमी पार्टी के कम से कम 20 से 30 विधायक भाजपा और कांग्रेस के संपर्क में हैं। विशेष रूप से वे विधायक, जिन्हें डर है कि 2027 के चुनावों में उनका टिकट काटा जा सकता है, या जो भगवंत मान की कार्यशैली से लंबे समय से असंतुष्ट हैं, वे बहुत जल्द बड़ा कदम उठा सकते हैं। भाजपा के पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया और राज्य इकाई के अध्यक्ष के अनुसार, यह केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के कई और बड़े चेहरे भाजपा में शामिल होंगे क्योंकि ‘झाड़ू’ का कुनबा पूरी तरह बिखर चुका है। पार्टी के भीतर असंतोष का मुख्य कारण टिकट वितरण की नीति और हाल ही में किए गए संगठनात्मक बदलाव हैं। उदाहरण के लिए, समाना निर्वाचन क्षेत्र में चेतन सिंह जौड़ामाजरा की अनदेखी कर शिरोमणि अकाली दल के पूर्व वरिष्ठ नेता सुरजीत सिंह रखड़ा को हलका इंचार्ज बना दिया गया, जिससे जौड़ामाजरा का टिकट कटना तय माना जा रहा था। इसी प्रकार, कई अन्य क्षेत्रों में भी पुराने वफादारों को दरकिनार कर पैराशूट नेताओं को तरजीह दी जा रही है, जो आने वाले समय में एक बड़ी भगदड़ का कारण बन सकता है।भाजपा के लिए पंजाब हमेशा से एक कठिन राजनीतिक मैदान रहा है, विशेष रूप से तीन कृषि कानूनों के विरोध में हुए किसान आंदोलनों के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन अब, शिरोमणि अकाली दल के कमजोर होने और आम आदमी पार्टी के भीतर मचे इस घमासान के बीच, भाजपा पंजाब में अपने दम पर एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। आम आदमी पार्टी के कद्दावर हिंदू और सिख चेहरों को अपने पाले में लाकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह राज्य के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने के लिए तैयार है। पूर्व आईपीएस अधिकारी और सिख चेहरे के रूप में कुंवर विजय प्रताप की साफ-सुथरी छवि का उपयोग भाजपा माझा और मालवा क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए करेगी। वहीं जौड़ामाजरा और पठानमाजरा जैसे जमीनी नेताओं के आने से पटियाला और उसके आसपास के जिलों में भाजपा का सांगठनिक ढांचा मजबूत होगा। भाजपा का यह रणनीतिक कदम स्पष्ट करता है कि वह पंजाब में केवल एक छोटी हिस्सेदार बनकर नहीं रहना चाहती, बल्कि 2027 में ‘डबल इंजन’ की सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है।दरअसल पंजाब की राजनीति इस समय एक बेहद संवेदनशील और अनिश्चित मोड़ पर खड़ी है। आम आदमी पार्टी जिसे अपनी सबसे सुरक्षित राजनीतिक जागीर समझ रही थी, वहां आंतरिक कलह और अंतर्विरोधों के कारण दरारें साफ दिखने लगी हैं। पहली लिस्ट आते ही जो बगावत शुरू हुई है, उसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता का अति-केंद्रीकरण और विधायकों की आवाज को दबाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती हो सकता है। यह घटनाक्रम केवल विधायकों के दलबदल का मामला नहीं है, बल्कि यह पंजाब की जनता के उस जनादेश की परीक्षा है जो उसने पारंपरिक पार्टियों को नकार कर एक ‘इंकलाब’ के नाम पर दिया था। यदि भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल समय रहते अपने विधायकों के असंतोष को दूर करने और शासन व्यवस्था में सुधार करने में विफल रहते हैं, तो पंजाब में कमल का खिलना केवल समय की बात रह जाएगी। आगामी महीनों में होने वाले दलबदल और गठबंधन के नए समीकरण ही यह तय करेंगे कि पंजाब की कमान किसके हाथ में होगी, लेकिन फिलहाल के लिए इतना जरूर कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी का किला भीतर से दरक रहा है और इसकी गूंज दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक साफ सुनी जा सकती है।