कांशीराम के कारवां पर मायावती का स्पीड ब्रेकर

महापरिनिर्वाण दिवस पर मान्यवर कांशीराम को श्रद्धांजलि देना केवल पुष्प अर्पित करने या उनके चित्र पर माल्यार्पण करने का अवसर नहीं है। यह उस आंदोलन की आत्मपरीक्षा का दिन भी है, जिसने सदियों से सत्ता, सम्मान और संसाधनों से वंचित समाज को राजनीतिक चेतना दी थी। कांशीराम ने बहुजन समाज को यह विश्वास दिया था कि वह केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं, बल्कि सत्ता की दिशा तय करने वाली संगठित शक्ति बन सकता है।लेकिन आज वही बहुजन समाज एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है, जहां आगे कुआं और पीछे खाई दिखाई देती है। स्वतंत्र राजनीतिक मंच कमजोर है, संगठन बिखर रहा है, दूसरी पंक्ति का नेतृत्व लगभग अनुपस्थित है और दलित समाज के सामने यह प्रश्न खड़ा है कि वह जाए तो जाए कहां? इस स्थिति के लिए बाहरी ताकतों से अधिक जिम्मेदार वह नेतृत्व है, जिसने कांशीराम के आंदोलन को अपने व्यक्तित्व की चौहद्दी में कैद कर दिया। बसपा में जब से सतीश मिश्रा आए तब से पार्टी का ग्राफ गिरता जा रहा है। मायावती के सारे मुकदमे वहीं देख रहे हैं हो सकता है उनकी सलाह पर ही मायावती खामोश हो गई हो।
कांशीराम ने जगाया आत्मसम्मान
कांशीराम ने दलित राजनीति को करुणा, दया और याचना की राजनीति से निकालकर अधिकार, प्रतिनिधित्व और सत्ता की राजनीति बनाया। उन्होंने बामसेफ के माध्यम से शिक्षित कर्मचारियों को संगठित किया, डीएस-4 के जरिए बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से जागरूक किया और 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कर उस चेतना को चुनावी शक्ति में बदला।
उनका उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं था। वे समाज को पढ़ाना, जगाना और संगठित करना चाहते थे। उनका विश्वास था कि दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित समूह संख्या में बहुसंख्यक हैं, परंतु सत्ता और निर्णय-प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी नगण्य है। इसलिए उन्होंने नारा दिया कि बहुजन समाज को अपनी संख्या को राजनीतिक शक्ति में बदलना होगा।
कांशीराम का संगठन व्यक्ति नहीं, विचार और कार्यकर्ता पर आधारित था। वे गांव-गांव जाते थे, कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते थे और चुनाव को सामाजिक परिवर्तन के अभियान के रूप में देखते थे।मायावती ने इसी आंदोलन की राजनीतिक विरासत संभाली। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में उनका उभरना दलित समाज के लिए ऐतिहासिक क्षण था। जिस समाज को सदियों तक सत्ता की सीढ़ियों के नीचे खड़ा रखा गया, उसने पहली बार सत्ता के शीर्ष पर अपना प्रतिनिधि देखा। यह उपलब्धि कांशीराम की राजनीतिक दृष्टि और मायावती की चुनावी क्षमता का परिणाम थी।
आंदोलन से व्यक्ति केंद्रित पार्टी तक
कांशीराम के समय बीएसपी एक आंदोलनकारी राजनीतिक संगठन थी। मायावती के दौर में पार्टी धीरे-धीरे एक अत्यधिक केंद्रीकृत चुनावी मशीन में बदल गई। पार्टी की सारी शक्ति, निर्णय और दिशा एक ही केंद्र में सिमटती चली गई। कार्यकर्ता, विचार और संगठन पीछे छूटते गए तथा नेता का व्यक्तित्व पार्टी का पर्याय बन गया। यहीं से बहुजन आंदोलन की रफ्तार पर पहला बड़ा ब्रेक लगा।कांशीराम कार्यकर्ताओं को तैयार करते थे; मायावती ने नेताओं को नियंत्रित किया। कांशीराम संगठन का विस्तार करते थे; मायावती ने संगठन को अपने नेतृत्व की सुरक्षा का उपकरण बना दिया—ऐसा आरोप पार्टी से अलग हुए अनेक नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं ने लगाया। पार्टी में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित नहीं हुआ। जो नेता उभरे, वे या तो किनारे कर दिए गए, अपमानित हुए या पार्टी छोड़ने को मजबूर हो गए।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignette
बहुजन से सर्वजन और फिर अकेलापन
2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण सामाजिक इंजीनियरिंग के आधार पर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। बीएसपी ने 206 सीटें जीतीं। यह प्रयोग इस बात का प्रमाण था कि बहुजन राजनीति व्यापक सामाजिक गठबंधन बना सकती है। लेकिन यह गठबंधन सामाजिक न्याय और वैचारिक साझेदारी में स्थायी रूप से बदल नहीं सका।‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’ की ओर बढ़ना चुनावी दृष्टि से सफल रणनीति थी, परंतु इसके साथ बीएसपी की मूल वैचारिक पहचान धुंधली पड़ गई। दलित समाज को लगा कि जिस पार्टी का निर्माण उसके आत्मसम्मान और स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए हुआ था, वह सत्ता के लिए उन्हीं सामाजिक शक्तियों से समझौता कर रही है, जिनके वर्चस्व के विरुद्ध आंदोलन खड़ा किया गया था।गठबंधन राजनीति में समझौते आवश्यक होते हैं, लेकिन समझौते की अपनी सीमाएं और शर्तें भी होती हैं। यदि बहुजन राजनीति सत्ता के लिए सामाजिक गठबंधन बनाती है, तो उसे दलित अधिकार, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार, भूमि, सुरक्षा और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को केंद्र में बनाए रखना चाहिए। परंतु बीएसपी में चुनावी गणित तो बचा रहा, आंदोलन की बेचैनी और वैचारिक संवाद धीरे-धीरे समाप्त होते गए।
आंकड़े दे रहे हैं चेतावनी
बीएसपी का चुनावी पतन किसी अफवाह या विरोधी दल के प्रचार का परिणाम नहीं, बल्कि सार्वजनिक चुनावी आंकड़ों में दिखाई देने वाली वास्तविकता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी की सीटें 2012 में 80 से घटकर 2017 में 19 और 2022 में केवल एक रह गईं। 2024 के लोकसभा चुनाव में BSP उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट प्रतिशत लगभग 9.35 प्रतिशत रह गया। ये आंकड़े बताते हैं कि कांशीराम और मायावती ने जिस सामाजिक गठजोड़ को खड़ा किया था, वह अब गंभीर रूप से कमजोर हो चुका है। दलित समाज का बड़ा हिस्सा दूसरे दलों की ओर जा रहा है और पार्टी का संगठन जनता के बीच अपनी पुरानी पकड़ खोता जा रहा है।मायावती को यह स्वीकार करना होगा कि केवल रैलियां, स्मृति-दिवस और कांशीराम के नाम का उल्लेख संगठन को पुनर्जीवित नहीं कर सकते। किसी आंदोलन का उत्तराधिकार नारों से नहीं, जनता के संघर्षों में भागीदारी से सिद्ध होता है।
जेल का भय या राजनीतिक रणनीति?
मायावती की राजनीतिक निष्क्रियता को लेकर सबसे तीखा आरोप यह है कि वे केंद्रीय जांच एजेंसियों और संभावित कानूनी कार्रवाई के दबाव में भाजपा के विरुद्ध खुलकर संघर्ष नहीं करतीं। यह आरोप प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि किसी व्यक्ति के मनोभाव या राजनीतिक निर्णय के पीछे छिपे वास्तविक कारण का निर्णायक प्रमाण सार्वजनिक नहीं है। फिर भी यह सवाल जनता के बीच क्यों पैदा हुआ, इस पर विचार करना आवश्यक है।भी बीएसपी कांग्रेस और भाजपा दोनों को वैचारिक प्रतिद्वंद्वी मानती थी। आज पार्टी कई बार विपक्षी एकता से दूरी बनाए रखती है, महत्वपूर्ण जनमुद्दों पर सीमित प्रतिक्रिया देती है और चुनाव के समय स्वतंत्र रास्ता चुनती है। इससे मतदाताओं में यह धारणा बनी है कि BSP सत्ता के खिलाफ निर्णायक संघर्ष करने के बजाय अपने अस्तित्व की रक्षा में लगी है।विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा जितनी ‘चाबी’ भरती है, बीएसपी उतना ही राजनीतिक रूप से सक्रिय या निष्क्रिय दिखाई देती है। यह आरोप सही हो या गलत, लेकिन इतना स्पष्ट है कि मायावती अपनी राजनीतिक भूमिका को जनता के सामने विश्वसनीय ढंग से स्पष्ट नहीं कर पाई हैं।
सत्ता का पद, लेकिन शक्ति नहीं
दलित समाज की विडंबना यह है कि उसके पास संख्या है, लेकिन संगठित राजनीतिक शक्ति नहीं। चुनाव के समय सभी दल दलितों को लोकतंत्र का निर्णायक मतदाता बताते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें नीति-निर्धारक भागीदार बनाने से बचते हैं। दलितों को वोट बैंक समझा जाता है, स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति नहीं। कांग्रेस संविधान और सामाजिक न्याय की भाषा बोलती है। समाजवादी पार्टी दलितों को अपने सामाजिक गठबंधन में शामिल करने की कोशिश करती है। भाजपा कल्याणकारी योजना और गैर-जाटव प्रतिनिधित्व के जरिए दलित आधार मजबूत करती है, लेकिन इन दलों में दलित समाज की स्वतंत्र नीति-निर्धारक भूमिका अभी सीमित है।
बहुजन समाज के लिए सलाह
सबसे पहली सलाह यह है कि बहुजन समाज व्यक्ति पूजा से बाहर निकले। कांशीराम ने कभी समाज को किसी एक व्यक्ति की भक्ति के लिए संगठित नहीं किया था; उन्होंने उसे अधिकार और भागीदारी के लिए संगठित किया था। इसलिए मायावती का सम्मान हो सकता है, लेकिन आलोचनात्मक विवेक को समाप्त नहीं किया जा सकता।दूसरी सलाह है कि दलित समाज अपने मुद्दों पर साझा राजनीतिक एजेंडा तैयार करे। शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व, भूमि-अधिकार, सामाजिक सुरक्षा, अत्याचारों से संरक्षण और राजनीतिक भागीदारी—इन विषयों पर दलों से लिखित प्रतिबद्धता मांगी जानी चाहिए।तीसरी सलाह यह है कि नेतृत्व गांव, छात्र संगठनों, महिला समूहों, श्रमिक संगठनों और सामाजिक आंदोलनों से उभरे। केवल बड़े नेताओं के भरोसे कोई समाज स्थायी राजनीतिक शक्ति नहीं बन सकता।चौथी सलाह मायावती के लिए है। यदि वे सचमुच कांशीराम की विरासत बचाना चाहती हैं, तो उन्हें पार्टी के दरवाजे खोलने होंगे, नए नेतृत्व को अवसर देना होगा, कार्यकर्ताओं से संवाद करना होगा और जनता के संघर्षों में सक्रिय भागीदारी करनी होगी। उन्हें यह भ्रम छोड़ना होगा कि पार्टी उनके बाद भी उसी तरह चलती रहेगी। कोई भी आंदोलन उत्तराधिकारी पैदा किए बिना जीवित नहीं रहता।अंततः दलित समाज को यह तय करना होगा कि वह किसी दल का स्थायी वोट बैंक बनेगा या अपनी राजनीतिक शर्तें स्वयं तय करेगा। बहुजन राजनीति का भविष्य न तो केवल मायावती के हाथ में है और न ही किसी नए नेता के आगमन से अपने आप सुरक्षित हो जाएगा। भविष्य संगठन, विचार, संघर्ष और लोकतांत्रिक नेतृत्व से बनेगा।डॉ. सुनील कुमार राजनीतिक विश्लेषक, असिस्टेंट प्रोफेसर, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर।

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