सतत् कपास उत्पादन से फसल विविधीकरण और जल संसाधन संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा : मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी

नई दिल्ली, हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए प्रदेश में ऐसी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है, जिनसे कम पानी और कम संसाधनों में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके। सतत् कपास उत्पादन, फसल विविधीकरण और जल संसाधनों का संरक्षण आज की खेती की जरूरत ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित कृषि व्यवस्था का रोडमैप भी है।मुख्यमंत्री वीरवार को चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में आयोजित दो दिवसीय कृषि मेला (रबी) का शुभारंभ करने के बाद किसानों, कृषि वैज्ञानिकों एवं कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर कृषि प्रदर्शनी का अवलोकन किया और विभिन्न स्टॉलों पर किसानों के लिए प्रदर्शित नवीनतम कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों, कृषि यंत्रों एवं अन्य कृषि उत्पादों की जानकारी ली।मुख्यमंत्री ने कहा कि कृषि मेला किसानों और वैज्ञानिकों के बीच ज्ञान एवं तकनीक के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण मंच है। यहां किसानों को उन्नत रबी बीज, आधुनिक कृषि तकनीक, मशीनरी, फसल प्रबंधन तथा कृषि क्षेत्र में हो रहे नवीनतम शोध की जानकारी एक ही स्थान पर मिलती है। उन्होंने मेले में प्रदर्शित की गई कपास चुगाई की मशीन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मशीन एक घंटे में एक एकड़ की कपास चुगाई करती है और हाथ से चुगाई के मुकाबले में इसमें समय भी आधा लगता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हरियाणा सरकार कपास चुगाई तथा गन्ना छिलाई जैसी मशीनों व इस प्रकार की अन्य तकनीकों को बढावा दे रही है ताकि लेबर की कमी से कपास और गन्ने का बुवाई क्षेत्र कम न हो।

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सतत् कपास उत्पादन और बदलती जलवायु के अनुरूप तकनीक विकसित करने पर जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि कपास हरियाणा की महत्वपूर्ण नकदी फसलों में से एक है। यह फसल विशेष रूप से सिरसा, फतेहाबाद, हिसार और आसपास के क्षेत्र में लाखों किसान परिवारों की आजीविका से जुड़ी हुई है। इसलिए इसे हम गर्व से सफेद सोना कहते हैं। हमारे कृषि विश्वविद्यालय और सिरसा स्थित कपास अनुसंधान केंद्र ने नई किस्मों, बेहतर बीज और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन में सराहनीय काम किया है। उन्होंने कहा कि आज कपास की खेती के सामने नई चुनौतियां भी हैं। मौसम में तेजी से बदलाव हो रहा है। इसलिए हमें ऐसी कृषि तकनीक और ऐसी बीज किस्मों पर तेजी से काम करना होगा, जो बदलते मौसम और कीटों का बेहतर मुकाबला कर सकें ।मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने कपास की खेती के लिए ऐसे ही उपायों की जानकारी देने के लिए 257 कपास किसान खेत पाठशालाएं आयोजित की हैं। इनमें 7 हजार से अधिक किसानों को कपास के खेत पर ही कपास की बिजाई से लेकर चुगाई तक हानिकारक कीटों की पहचान करके उनके उत्तम प्रबंधन हेतु अधिक पैदावार लेने के लिए जागरूक किया गया। इसके अलावा, 167 किसान मेलों में कम लागत से कपास उत्पादन करके अधिक मुनाफा कमाने के उपाय बताए गए। उन्होंने कहा कि इस मेले के थीम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू फसल विविधीकरण है। पानी है तो खेती है, गांव है और जीवन है। हरियाणा ने देश की खाद्य सुरक्षा में बहुत बड़ा योगदान दिया है, लेकिन हमें अपने भूजल की भी चिंता करनी होगी। हमें ऐसी खेती की ओर बढऩा होगा, जिसमें कम पानी में अधिक और बेहतर उत्पादन हो। लगातार एक ही प्रकार की फसलें उगाने से मिट्टी की सेहत प्रभावित होती है। परंपरागत रूप से गेहूं व धान उगाने से पानी की खपत ज्यादा होती है, जबकि पूरी दुनिया जल संकट का सामना कर रही है । इसलिए हमें दलहन, तिलहन और कम पानी से उगने वाली फसलों को अपनाना होगा ।मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने ऐसी फसलों को बढ़ावा देने के लिए मेरा पानी- मेरी विरासत योजना चलाई हुई है। इस योजना के तहत वैकल्पिक फसलें लेने या खेत खाली छोड़ने वाले किसानों को 8 हजार रुपये प्रति एकड़ वित्तीय सहायता दी जाती है। अब तक 2 लाख 34 हजार एकड़ में धान की जगह वैकल्पिक फसलें बोने पर 1 लाख 59 हजार किसानों को 166 करोड़ 34 लाख रुपये की वित्तीय सहायता दी है। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य कम पानी में अधिक सिंचाई करना है। इसलिए हम वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी माइक्रो इरिगेशन तकनीकों को भी बढ़ावा दे रहे हैं। माइक्रो इरीगेशन तकनीकों पर 85 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। किसानों को तालाब बनाने के लिए भी 85 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है। पानी की बचत के अलावा, इसके दोबारा उपयोग के लिए हमने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स के शोधित पानी को सिंचाई के लिए इस्तेमाल करने की 27 योजनाएं तैयार की हैं, इनमें से 20 पूरी हो चुकी हैं। इनसे सिंचाई के लिए एक स्थायी जल स्रोत मिलेगा, नहरों पर दबाव कम होगा और भूजल का दोहन भी घटेगा।मुख्यमंत्री ने कहा कि जल सुरक्षा के साथ-साथ मिट्टी की सेहत की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। हमने किसान के खेत की मिट्टी के स्वास्थ्य की जांच करके 1 करोड़ 6 लाख सॉयल हेल्थ कार्ड जारी किये हैं। हमने प्रदेश में मिट्टी के नमूनों की जांच के लिए 17 नई मृदा एवं जल परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित की हैं।उन्होंने बताया कि विभिन्न मंडियों में भी 54 नई लघु मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं खोली गई हैं। इसके अलावा, स्कूलों व कॉलेजों में 240 लघु मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित की जा चुकी हैं। हमने हर खेत-स्वस्थ खेत का पोर्टल भी लॉन्च किया है। इस पोर्टल पर पंजीकरण करवा कर कोई भी किसान अपनी मिट्टी की जांच करवा सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान समय में ड्रोन, सेंसर तकनीक, मौसम की डिजिटल जानकारी, सटीक खेती और कृषि स्टार्टअप अब खेती का हिस्सा बन रहे हैं।

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