Tue. Aug 20th, 2019
सुस्त लाइफस्टाइल से बढ़ती डीवीटी की बीमारी

सुस्त लाइफस्टाइल से बढ़ती डीवीटी की बीमारी

उमेष कुमार सिंह
आराम पसंद लाइफ स्टाइल और फैटी फूड से दिल के रोगों का ही नहीं, डीवीटी यानी डीप वीन थ्रॉम्बोसिस का खतरा भी बढ़ रहा है. डीवीटी शरीर की गहराई में खून का थक्का बन जाने को कहते हैं. कभी-कभी इसको ‘‘इक्नॉमी क्लॉस सिंड्रोम’’ भी कहा जाता है. क्योंकि इसके विकास के साथ ही इसकी बढने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं. जब शरीर की विभिन्न गतिविधियां रूक जाती है जैसे लंबी व जटील हवाई यात्रा के दौरान पैरों का सून पड़ जाना. यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब शरीर के किसी भाग में खून जम जाता है. ज्यादातर पैरों की लंबी शिराओं में, हाथों, कंधों पर ऐसा होता है.
क्या होता असर
डा.संजय अग्रवाला का कहना है कि डीवीटी के कारण प्रभावित अंग में खून की सप्लाई पर असर पडने लगता है. इसके कारण दर्द, सूजन और प्रभावित अंग में भारीपन हो जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक डीवीटी में जो थक्के बनते हैं, उनके लंगस में पहुंचने पर अचानक सांस लेने में दिक्कत हो सकती हैं. ये अगर दिल या ब्रेन में पहुंच जाएं तो हार्ट अटैक या स्ट्रोक की वजह बन सकते हैं.
क्यों होता डीवीटी की समस्या
ज्यादातर लोग आजकल शारीरिक श्रम नहीं करते. चलने फिरने से भी उन्हें पहरेज रहता है. यह इसकी वजह बन सकता है. इसके अलावा जंग फूड और तंबाकू आदि का सेवन भी इस समस्या को बढ़ा रहा है. इसके कारण युवा और बच्चों तक इसकी चपेट में आने लगे हैं.
निदान और उपचार
डा.संजय अग्रवाला का कहना है कि आज कल डीवीटी का अल्ट्रासाउंड द्वारा भी पता लगाया जाता है. डॉक्टरों का विश्वास है कि इस तरीके का प्रयोग कर वह छोटे-छोटे थक्कों का पता लगा सकते हैं. थ्रोम्बोसिस का खून की जांच करके भी पता लगाया जा सकता है. जो कि एक बहुत अच्छा तरीका माना जाता है. एक ऐसी जांच जो क्लोटिंग सामग्री के बाय-प्रोडक्ट्ड्ढस के स्तर को मापती है डी-डीमर कहलाती है और इसका इस्तेमाल आजकल बहुत प्रचलन में हैं. डीवीटी के असरदायक प्रबंधन के लिए इसका जल्द निदान, शीघ्र रोग निरोधन और संपूर्ण इलाज निर्णायक हैं. जब आप बैठे हो तो पैरों के विभिन्न व्यायाम करने जैसे एडियों को घुमाना, पैरों की उंगलियों को हिलाना-डुलाना आदि करते रहना चाहिए. क्यों कि इससे पैरों में खून एकत्रित होने से बच जाएगा और इसके बाद शरीर में खून का प्रवाह लगातार बना रहेगा.
यह है इलाज
डा.संजय अग्रवाला के अनुसार डीवीटी के निदान के लिए इसमें आमतौर पर प्रारंभ में इंजेक्शन के जरिए हैपरीन की ऊंची मात्रा दी जाती है. मरीज को वारफैरीन की भी दवाई कुछ महीनों तक खाने के लिए निर्देशित की जाती है. जब तक यह रक्त विरलन दवाइयां ली जाती है मरीज को रोजाना अपने खून की जांच करानी पड़ती है कि मरीज सही तरीके से दवाइयां ले रहा है तथा वह हैमोरेज के खतरे में तो नहीं है. डीवीटी के लक्षणों से बचने के लिए दर्द विनाशक व उस स्थान पर गर्मी पहुंचाने वाली दवाइयां लेने की डॉक्टर द्वारा राय दी जाती है.

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